काव्यांशों की सप्रस
ं ग व्याख्या-
1- आह! वेदना मिली विदाई!
मैंने भ्रमवश जीवन संचित मधुकरियों की भीख लुटाई।
छलछल थे स
ं ध्या के श्रमकण आँ सू-से गिरते थे प्रतिक्षण।
मेरी यात्रा पर लेती थी नीरवता अनंत अ
ँ गड़ाई।
व्याख्या:
2- घर घर चीर रचा सब काहू
ँ । मोर रूप रंग लै गा नाहू।।
पलटी न बहुरा गा जो बिछुओई। अबहूं फिरै फिरै रंग सोई।।
सियरि अगिनि बिरहनि हिय जारा। सुलगि सुलगि दगधै भै छारा ।।
यह दुख दगध न जानै क
ं तू। जोबन जनम करै भसमंतू व्याख्या-
3- यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
वह पीड़ा, जिस की गहराई को स्वयं उसी ने नापा;
कुत्सा, अपमान, अज्ञेय के धु
ँ धुआते कडु वे तम में
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र, उल्ल
ं ब-बाहु, यह चिर-अख
ं ड अपनापा।
जिज्ञासु, अचेतन, सदा श्रद्धामय, अन्यत्र भक्ति को दे दो-
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
व्याख्या:
4- इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है
यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है कि हिलता नहीं है
कुछ भी कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
ं ग व्याख्या-
1- आह! वेदना मिली विदाई!
मैंने भ्रमवश जीवन संचित मधुकरियों की भीख लुटाई।
छलछल थे स
ं ध्या के श्रमकण आँ सू-से गिरते थे प्रतिक्षण।
मेरी यात्रा पर लेती थी नीरवता अनंत अ
ँ गड़ाई।
व्याख्या:
2- घर घर चीर रचा सब काहू
ँ । मोर रूप रंग लै गा नाहू।।
पलटी न बहुरा गा जो बिछुओई। अबहूं फिरै फिरै रंग सोई।।
सियरि अगिनि बिरहनि हिय जारा। सुलगि सुलगि दगधै भै छारा ।।
यह दुख दगध न जानै क
ं तू। जोबन जनम करै भसमंतू व्याख्या-
3- यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
वह पीड़ा, जिस की गहराई को स्वयं उसी ने नापा;
कुत्सा, अपमान, अज्ञेय के धु
ँ धुआते कडु वे तम में
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र, उल्ल
ं ब-बाहु, यह चिर-अख
ं ड अपनापा।
जिज्ञासु, अचेतन, सदा श्रद्धामय, अन्यत्र भक्ति को दे दो-
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
व्याख्या:
4- इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है
यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है कि हिलता नहीं है
कुछ भी कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है