(i) काव्ाांश की सप्रसांग व्ाख््ा- 6
भूपति मरण पेम पनु राखि। जननी कुमति जगिु सबु सािी।। दे खि न जाहहिं बबकल महिारी। जरहहिं
दस
ु ह जर परु नर नारी।। महीिं सकल अनरु थ कर मल
ू ा। सो सतु न समखु ि सहहउ सब सल
ू ा।। सतु न बन
गावणु कीन्ह रघुथा। करर मुतन बेष लिनु ससय साथा।। बबनहहिं पयादे हह पा। सिंरसु सिी रहुुँ ऐहह घाएुँ।
बहुरर तनहारर तनषाद सनेहू। कुलीस कठोर उर भयौ न बेहू।। अब सबु आिंखिन्ह दे िौं आई। जीअि जीव
जड़वि सबै सहाई।। जजन्हहह तनरखि मग सपपतन बबजछि। िजहहिं बबषम बबषु िापस तिचि।। िेइ रघुलन्दु
लिनु ससय अनहहि
सप्रसांग व्ाख््ा:
सांदर्भ: यह कावयािंश हमारी पाठ्यपुस्िक के अन्िगगि पाठ “ भरि राम का प्रेम” से सलया गया
है। जो गोस्वामी िुलसीदास द्वारा रचिि ‘रामिररिमानस’ के अयोध्याकाण्ड से उद्धि
ृ है।
प्रसांग: राम के वन गमन और दशरथ की मत्ृ यु के बाद अयोध्या की दयनीय जस्थति का वणगन
है।
व्ाख््ा: िल
ु सीदास जी कहिे हैं कक राजा दशरथ ने प्रेम के प्रण (विन) को तनभाने के सलए
अपने प्राण त्याग हदए। रानी कैकेयी की कुबुद्चध (मिंथरा के बहकावे में) के कारण यह सब
हुआ, और सारा सिंसार इसका गवाह है। अयोध्या की मािाएिं अत्यिंि वयाकुल हैं । और उनका
दिु दे िा नहीिं जा रहा है। नगर के नर-नारी पवरह की असह्य अजनन में जल रहे हैं। यह
सारा अनथग (दुःु ि) मूलिुः कैकेयी की कुबद्
ु चध का फल है। यह सुनकर और समिकर सभी
कष्ट सह रहे हैं।
श्रीराम ने वन गमन की बाि सन
ु कर मुतन का वेश धारण ककया और सीिा-लक्ष्मण के साथ
वन के सलए प्रस्थान ककया। बबना रथ (पैदल) के वन जािे हुए राम-लक्ष्मण को दे िकर सभी
दि
ु ी हैं। तनषादराज के प्रेम को दे िकर भी हृदय (कैकेयी का) वज्र से भी कठोर बना रहा, जो
पपघला नहीिं। अब, मैं अपनी आुँिों से दे ि रहा हूुँ कक राम, लक्ष्मण और सीिा के पवयोग में
अयोध्यावासी जीपवि रहिे हुए भी तनजीव की िरह हो गए हैं। जजनकी िाया में रहकर सािंप
और बबछिू भी अपने भयिंकर पवष के िाप (क्रोध) को त्याग दे िे थे, उन रघक
ु ु ल के ििंद्रमा
राम, लक्ष्मण और सीिा के अनहहि (अहहि) की कल्पना भी नहीिं की जा सकिी।
विशेष:
1. र्ाषा: साहहजत्यक अवधी भाषा।
2. शैिी: करुण रस से पररपण
ू ग वणगनात्मक शैली।
3. अिांकार: अनुप्रास अलिंकार का सद
िंु र प्रयोग।