प्रेमचंद
गोदान
ह द
ं ीकोश
www.hindikosh.in
,Godan
By Premchand
Devanagari text reconstituted from the roman transcription made
under the direction of Professors T. Nara and K. Machida of the
Institute for Study of Languages http://www.aa.tufs.ac.jp/ and
Cultures of Asia and Africa at Tokyo University of Foreign
Studies.
यूनीकोड संस्करण: संजय खत्री. 2012
Unicode Edition: Sanjay Khatri, 2012
य पस्
ु तक प्रकाशनाधिकार मक्
ु त ै क्योंकक इसकी प्रकाशनाधिकार अवधि
समाप्त ो चक
ु ी ैं।
This work is in the public domain in India because its term of
copyright has expired.
आवरण धचत्र सौजन्य (प्रेमचंद): Wikipedia.org
Cover Image by Sanjay Khatri: Based on image from
http://animalphotos.info.
ह द
ं ीकोश
Hindikosh.in
http://www.hindikosh.in
,प्रेमचंद
गोदान
ोरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी दे कर अपनी स्त्री ि नया से क ा -- गोबर
को ऊख गोड़ने भेज दे ना। मैं न जाने कब लौटूूँ। ज़रा मेरी लाठी दे दे ।
ि नया के दोनों ाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आयी थी। बोली -- अरे ,
कुछ रस-पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या ै।
ोरी ने अपने झुररयों से भरे ु ए माथे को ससकोड़कर क ा -- तुझे रस-पानी की
पड़ी ै , मझ
ु े य धचन्ता ै कक अबेर ो गयी तो मासलक से भें ट न ोगी।
असनान-पूजा करने लगें गे, तो घंटों बैठे बीत जायगा।
'इसी से तो क ती ू ूँ , कुछ जलपान कर लो। और आज न जाओगे तो कौन रज़
ोगा। अभी तो परसों गये थे।'
'तू जो बात न ीं समझती, उसमें टाूँग क्यों अड़ाती ै भाई! मेरी लाठी दे दे और
अपना काम दे ख। य इसी समलते-जुलते र ने का परसाद ै कक अब तक जान
बची ु ई ै । न ीं क ीं पता न लगता कक ककिर गये। गाूँव में इतने आदमी तो
ैं, ककस पर बेदख़ली न ीं आयी, ककस पर कुड़की न ीं आयी। जब दस ू रे के पाूँवों-
तले अपनी गदद न दबी ु ई ै , तो उन पाूँवों को स लाने में ी कुशल ै ।'
ि नया इतनी व्यव ार-कुशल न थी। उसका ववचार था कक मने ज़मींदार के
खेत जोते ैं , तो व अपना लगान ी तो लेगा। उसकी ख़श
ु ामद क्यों करें , उसके
तलवे क्यों स लायें। यद्यवप अपने वववाह त जीवन के इन बीस बरसों में उसे
अच्छी तर अनुभव ो गया था कक चा े ककतनी ी कतर-ब्योंत करो, ककतना ी
पेट-तन काटो, चा े एक-एक कौड़ी को दाूँत से पकड़ो; मगर लगान बेबाक़ ोना
मश्ु ककल ै । किर भी व ार न मानती थी, और इस ववषय पर स्त्री-परु
ु ष में
आये हदन संग्राम छड़ा र ता था। उसकी छः सन्तानों में अब केवल तीन श्ज़न्दा
ैं, एक लड़का गोबर कोई सोल साल का, और दो लड़ककयाूँ सोना और रूपा,
, बार और आठ साल की। तीन लड़के बचपन ी में मर गये। उसका मन आज
भी क ता था, अगर उनकी दवादारू ोती तो वे बच जाते; पर व एक िेले की
दवा भी न मूँगवा सकी थी। उसकी ी उम्र अभी क्या थी। छत्तीसवाूँ ी साल
तो था; पर सारे बाल पक गये थे, चे रे पर झुररद याूँ पड़ गयी थीं। सारी दे ढल
गयी थी, व सुंदर गे ु आूँ रं ग सूँवला गया था और आूँखों से भी कम सूझने लगा
था। पेट की धचंता ी के कारण तो। कभी तो जीवन का सख ु न समला। इस
धचरस्थायी जीणाणदवस्था ने उसके आत्म-सम्मान को उदासीनता का रूप दे हदया
था। श्जस ग ृ स्थी में पेट की रोहटयाूँ भी न समलें , उसके सलए इतनी ख़ुशामद
क्यों? इस पररश्स्थ त से उसका मन बराबर ववद्रो ककया करता था। और दो चार
घुड़ककयाूँ खा लेने पर ी उसे यथाथद का ज्ञान ोता था।
उसने परास्त ोकर ोरी की लाठी, समरजई, जूत,े पगड़ी और तमाखू का बटुआ
लाकर सामने पटक हदये।
ोरी ने उसकी ओर आूँखें तरे र कर क ा -- क्या ससुराल जाना ै जो पाूँचों
पोसाक लायी ै ? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सल ज न ीं बैठी ै , श्जसे
जाकर हदखाऊूँ।
ोरी के ग रे साूँवले, वपचके ु ए चे रे पर मुस्करा ट की मद
ृ त
ु ा झलक पड़ी।
ि नया ने लजाते ु ए क ा -- ऐसे ी तो बड़े सजीले जवान ो कक साली-सल जें
तम्
ु ें दे ख कर रीझ जायूँगी!
ोरी ने िटी ु ई समरजई को बड़ी साविानी से त करके खाट पर रखते ु ए
क ा -- तो क्या तू समझती ै , मैं बूढ़ा ो गया? अभी तो चालीस भी न ीं ु ए।
मदद साठे पर पाठे ोते ैं।
'जाकर सीसे में मूँु दे खो। तुम-जैसे मदद साठे पर पाठे न ीं ोते। दि
ू -घी अंजन
लगाने तक को तो समलता न ीं, पाठे ोंगे! तुम् ारी दशा दे ख-दे खकर तो मैं और
भी सूखी जाती ू ूँ कक भगवान ण य बुढ़ापा कैसे कटे गा? ककसके द्वार पर भीख
माूँगेंगे?'
गोदान
ह द
ं ीकोश
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,Godan
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Devanagari text reconstituted from the roman transcription made
under the direction of Professors T. Nara and K. Machida of the
Institute for Study of Languages http://www.aa.tufs.ac.jp/ and
Cultures of Asia and Africa at Tokyo University of Foreign
Studies.
यूनीकोड संस्करण: संजय खत्री. 2012
Unicode Edition: Sanjay Khatri, 2012
य पस्
ु तक प्रकाशनाधिकार मक्
ु त ै क्योंकक इसकी प्रकाशनाधिकार अवधि
समाप्त ो चक
ु ी ैं।
This work is in the public domain in India because its term of
copyright has expired.
आवरण धचत्र सौजन्य (प्रेमचंद): Wikipedia.org
Cover Image by Sanjay Khatri: Based on image from
http://animalphotos.info.
ह द
ं ीकोश
Hindikosh.in
http://www.hindikosh.in
,प्रेमचंद
गोदान
ोरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी दे कर अपनी स्त्री ि नया से क ा -- गोबर
को ऊख गोड़ने भेज दे ना। मैं न जाने कब लौटूूँ। ज़रा मेरी लाठी दे दे ।
ि नया के दोनों ाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आयी थी। बोली -- अरे ,
कुछ रस-पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या ै।
ोरी ने अपने झुररयों से भरे ु ए माथे को ससकोड़कर क ा -- तुझे रस-पानी की
पड़ी ै , मझ
ु े य धचन्ता ै कक अबेर ो गयी तो मासलक से भें ट न ोगी।
असनान-पूजा करने लगें गे, तो घंटों बैठे बीत जायगा।
'इसी से तो क ती ू ूँ , कुछ जलपान कर लो। और आज न जाओगे तो कौन रज़
ोगा। अभी तो परसों गये थे।'
'तू जो बात न ीं समझती, उसमें टाूँग क्यों अड़ाती ै भाई! मेरी लाठी दे दे और
अपना काम दे ख। य इसी समलते-जुलते र ने का परसाद ै कक अब तक जान
बची ु ई ै । न ीं क ीं पता न लगता कक ककिर गये। गाूँव में इतने आदमी तो
ैं, ककस पर बेदख़ली न ीं आयी, ककस पर कुड़की न ीं आयी। जब दस ू रे के पाूँवों-
तले अपनी गदद न दबी ु ई ै , तो उन पाूँवों को स लाने में ी कुशल ै ।'
ि नया इतनी व्यव ार-कुशल न थी। उसका ववचार था कक मने ज़मींदार के
खेत जोते ैं , तो व अपना लगान ी तो लेगा। उसकी ख़श
ु ामद क्यों करें , उसके
तलवे क्यों स लायें। यद्यवप अपने वववाह त जीवन के इन बीस बरसों में उसे
अच्छी तर अनुभव ो गया था कक चा े ककतनी ी कतर-ब्योंत करो, ककतना ी
पेट-तन काटो, चा े एक-एक कौड़ी को दाूँत से पकड़ो; मगर लगान बेबाक़ ोना
मश्ु ककल ै । किर भी व ार न मानती थी, और इस ववषय पर स्त्री-परु
ु ष में
आये हदन संग्राम छड़ा र ता था। उसकी छः सन्तानों में अब केवल तीन श्ज़न्दा
ैं, एक लड़का गोबर कोई सोल साल का, और दो लड़ककयाूँ सोना और रूपा,
, बार और आठ साल की। तीन लड़के बचपन ी में मर गये। उसका मन आज
भी क ता था, अगर उनकी दवादारू ोती तो वे बच जाते; पर व एक िेले की
दवा भी न मूँगवा सकी थी। उसकी ी उम्र अभी क्या थी। छत्तीसवाूँ ी साल
तो था; पर सारे बाल पक गये थे, चे रे पर झुररद याूँ पड़ गयी थीं। सारी दे ढल
गयी थी, व सुंदर गे ु आूँ रं ग सूँवला गया था और आूँखों से भी कम सूझने लगा
था। पेट की धचंता ी के कारण तो। कभी तो जीवन का सख ु न समला। इस
धचरस्थायी जीणाणदवस्था ने उसके आत्म-सम्मान को उदासीनता का रूप दे हदया
था। श्जस ग ृ स्थी में पेट की रोहटयाूँ भी न समलें , उसके सलए इतनी ख़ुशामद
क्यों? इस पररश्स्थ त से उसका मन बराबर ववद्रो ककया करता था। और दो चार
घुड़ककयाूँ खा लेने पर ी उसे यथाथद का ज्ञान ोता था।
उसने परास्त ोकर ोरी की लाठी, समरजई, जूत,े पगड़ी और तमाखू का बटुआ
लाकर सामने पटक हदये।
ोरी ने उसकी ओर आूँखें तरे र कर क ा -- क्या ससुराल जाना ै जो पाूँचों
पोसाक लायी ै ? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सल ज न ीं बैठी ै , श्जसे
जाकर हदखाऊूँ।
ोरी के ग रे साूँवले, वपचके ु ए चे रे पर मुस्करा ट की मद
ृ त
ु ा झलक पड़ी।
ि नया ने लजाते ु ए क ा -- ऐसे ी तो बड़े सजीले जवान ो कक साली-सल जें
तम्
ु ें दे ख कर रीझ जायूँगी!
ोरी ने िटी ु ई समरजई को बड़ी साविानी से त करके खाट पर रखते ु ए
क ा -- तो क्या तू समझती ै , मैं बूढ़ा ो गया? अभी तो चालीस भी न ीं ु ए।
मदद साठे पर पाठे ोते ैं।
'जाकर सीसे में मूँु दे खो। तुम-जैसे मदद साठे पर पाठे न ीं ोते। दि
ू -घी अंजन
लगाने तक को तो समलता न ीं, पाठे ोंगे! तुम् ारी दशा दे ख-दे खकर तो मैं और
भी सूखी जाती ू ूँ कक भगवान ण य बुढ़ापा कैसे कटे गा? ककसके द्वार पर भीख
माूँगेंगे?'