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HISTORY BY SACHIN SIR 7290908764
CH 3 - बंधुत्व, जाति और वर्ग
महाभारि की मुख्य कहानी
महाभारत प्राचीन भारत के महान ग्रंथ ं में से एक है।
इसकी मुख्य कहानी द चचेरे भाइय — ं कौरव ं और पांडव ं —के बीच युद्ध पर आधाररत है, ज कुरु वंश के राजकुमार थे।
यह कहनी कौरव ं और पांडव ं के बीच भूमम और सत्ता क लेकर हुए युद्ध का मचत्रण करती है।
इस युद्ध में पां डव ं की जीत हुई।
कुरु वंश की राजधानी: हस्तिनापुर
महाभारि का समाल चनात्मक सं स्करण
महाभारत का समाल चनात्मक संस्करण तैयार करने की प्रमिया 1919 में संस्कृत के प्रमसद्ध मवद्वान वी.एस.सु कथांकर ने शुरू की थी।
अने क मवद्वान ं ने ममलकर महाभारत का समाल चनात्मक संस्करण तैयार करने का मजम्मा उठाया।
पररय जना पर काम करने वाले मवद्वान ं ने सभी पां डुमलमपय ं में पाए जाने वाले श्ल क ं की तुलना करने का एक तरीका मनकाला।
उन् न ं े उन श्ल क ं का चयन मकया ज लगभग सभी पां डुमलमपय ं में पाए गए थे और उनका प्रकाशन 13,000 पन् ं में फैले अने क ग्रंथ खंड ं
में मकया।
इस पररय जना क पूरा करने में 47 साल लगें।
इस प्रमिया से द महत्वपूणण बातें सामने आईं:
1. पहली बाि: संस्कृत की अलग-अलग पां डुमलमपय ं में बहुत-से अंश एक जैसे थे। यह इसमलए पता चला क् मं क पूरे उपमहाद्वीप में—उत्तर
के कश्मीर और ने पाल से लेकर दमिण के केरल और तममलनाडु तक—सभी जगह ं की पां डुमलमपय ं में कई महस्से एक समान ममले।
2. दू सरी बाि: कई सौ वर्षों तक महाभारत क मलखते और पढ़ते समय अलग-अलग िेत्र ं में कुछ मभन्नताएँ भी मवकमसत ह गई थीं। इन
िेत्रीय अंतर क मुख्य पाठ की पादमिप्पमणय ं और पररमशष् ं में रखकर अलग से मदखाया गया। 13,000 पन्न ं में से आधे से ज़्यादा पन्ने इन्ीं
मभन्नताओं का मववरण दे ते हैं।
पररवार और बंधुिा के तलए प्रय र् ह ने वाले शब्द
कुल - संस्कृत ग्रंथ ं में ‘कुल’ शब्द का प्रय ग पररवार के मलए मकया जाता है।
जामत - ‘जामत’ शब्द का प्रय ग बंधुओं या ररश्तेदार ं के बडे समूह के मलए ह ता है।
वंश - मकसी कुल में पीढ़ी दर पीढ़ी जुडे सभी पूवणज एक ही वंश के माने जाते हैं।
पररवार
पररवार ररश्तेदार ं का एक बडा समूह ह ता है। मजनके बीच रक्त का संबंध ह ता है।
परं तु ये ररश्ते हमेशा मसर्फण रक्त संबंध ं पर आधाररत नहीं ह ते। कुछ समाज ं में चचेरे-ममेरे भाई-बहन (cousins) क क़रीबी ररश्तेदार माना
जाता है, जबमक कुछ में ऐसा नहीं ह ता।
तपिृवंतशकिा – इसका अथण है पररवार की वंशावली क मपता से ज डना।
मािृवंतशकिा – इसका अथण है पररवार की वंशावली क माँ की ओर से ज डना।
तववाह के प्रकार
अंितवगवाह : जब शादी अपने ही पररवार या ग त्र में की जाती है।
बतहतवगवाह :जब शादी अपने ग त्र के बाहर की जाती है।
बहुपत्नी प्रथा : जब एक पुरुर्ष की कई पमियाँ ह ती हैं।
बहुपति प्रथा : जब एक स्त्री के कई पमत ह ते हैं।
तववाह के तनयम
ऐसी पाररवाररक व्यवस्था में जहाँ वंश आगे बेिे से चलता था, बेमिय ं के साथ अलग तरह का व्यवहार मकया जाता था। उन्ें पररवार की
संपमत्त या धन पर अमधकार नहीं ममलता था।
यह माना जाता था मक बेमिय ं की शादी अपने ही ररश्तेदारी समूह (कुिु म्ब) में नहीं, बस्ति बाहर करनी चामहए।
इस प्रथा क बमहमवणवाह कहते हैं, मजसका अथण है—अपने पररवार या ग त्र के बाहर मववाह करना।
इसी वजह से, मवशेर्षकर ऊँचे दजे वाले पररवार ं की लडमकय ं पर कार्फी मनयंत्रण रखा जाता था तामक उनकी शादी सही उम्र और सही
व्यस्तक्त से कराई जा सके।
ल ग यह भी मानते थे मक कन्यादान मपता का धाममणक कतणव्य है।
धमगसूत्र / धमगशास्त्र
धमणशास्त्र ं में सामातजक व्यवहार के तनयम मलखे ह ते थे।
इन्ें ब्राह्मण ं ने संस्कृि में मलखा था।
इनका मनमाण ण लगभग 500 ईसा पूवण के आसपास हुआ।
ये मनयम मुख्य रूप से ब्राह्मण ं के मलए बनाए गए थे, लेमकन समाज के अन्य ल ग भी इन्ें मानते थे।
सबसे महत्वपूणण धमणसूत्र मनुस्मृति थी, मजसे लगभग 200 ईसा पूवग से 200 ईस्वी के बीच संकमलत मकया गया था।
मनुस्मृति में आठ प्रकार के तववाह ं का उल्लेख है
मववाह द ल ग ं के बीच एक कानूनी और सामामजक ररश्ता है ज पािण नर के रूप में एक साथ रहने , मजम्मेदाररयां बां िने और जीवन में एक-दू सरे
का साथ दे ने के मलए सहमत ह ते हैं।
तववाह के प्रकार
, ब्रह्म तववाह - इसमें मपता अपनी बेिी की शादी एक य ग्य वर से करता है मजसे वेद ं का ज्ञान ह ।
दै व तववाह: इसमें मपता अपनी बेिी का मववाह मकसी पूजारी या पुर महत से करता हैं।
आर्ग तववाह: इसमें वर वधू के मपता क एक गाय,बैल या उनका ज डा दे कर मववाह करता है।
प्रजापत्य तववाह - इसमें मपता वर से रह वचन लेकर मक वह धमणपूवणक ग्रहस्थ जीवन मनभाएगा, अपनी बेिी उसे सौंप दे ता है।
र्ं धवग तववाह : इसे "प्रेम मववाह" भी कहा जाता है, इसमें एक ज डा पररवार की मंजूरी के मबना आपसी सहममत से शादी करता है।
असु र तववाह: इसमें वर वधू के मपता या अन्य ररश्तेदार ं क धन दे कर वधू क खरीदता है।
राक्षस तववाह - रािस मववाह वह मववाह है मजसमें दु ल्हन क उसके घर से जबरदिी अपहरण करके, उसके पररवार से मारपीि या युद्ध
करने के बाद, दु ल्हन की सहममत के मबना मववाह मकया जाता है।
पैशाच तववाह - इसमें क ई पुरुर्ष स ई हुई, नशे में, मानमसक रूप से असमथण या असहाय स्त्री की सहममत के मबना उससे मववाह कर लेता
है।इसे मववाह का सबसे मनं दनीय और अमान्य रूप माना गया है।
र् त्र प्रणाली
ग त्र पद्धमत एक ब्राह्मणीय पद्धमत हैं।
इसकी शुरुआत लगभग 1000 ईसा पूवण में हुई थी।
प्रत्ये क ग त्र का नाम एक प्राचीन वैमदक ऋमर्ष के नाम पर रखा गया था, और एक ग त्र के सभी सदस् ं क उनका वंशज माना जाता था।
र् त्र प्रणाली के मुख्य तनयम
1. मववाह के बाद ममहलाओं क अपने मपता का ग त्र छ डकर अपने पमत का ग त्र अपनाना पडता था।
2. एक ही ग त्र के ल ग आपस में शादी नहीं कर सकते थे - इस मनयम ने बमहमवणवाह क बढ़ावा मदया।
सािवाहन वंश से उदाहरण
सातवाहन, मजन् न ं े पमिमी भारत और दक्कन पर शासन मकया (दू सरी शताब्दी ईसा पूवण – दू सरी शताब्दी ईस्वी), अपने मशलालेख ं के
माध्यम से महत्वपूणण सबूत दे ते हैं।
कई सातवाहन शासक बहुमववाही थे (उनकी एक से ज़्यादा पमियाँ थीं)।
कुछ रामनय ं के नाम से पता चलता है मक उन् न ं े शादी के बाद भी अपने मपता का ग त्र नाम (जैसे गौतम या वमशष्ठ) रखा, ज ब्राह्मणवादी
मनयम ं के स्तखलाफ था।
कुछ रामनयाँ त एक ही ग त्र की थीं, मजससे पता चलता है मक सजातीय मववाह (ररश्तेदार ं के समूह में शादी) का चलन था।
मनष्कर्षण
इससे पता चलता है मक वािमवक सामामजक प्रथाएँ कभी-कभी ब्राह्मणवादी आदशों से अलग थीं।
कुछ िेत्र ं में, जैसे दमिण भारत में, सजातीय मववाह (ररश्तेदार ं या चचेरे भाई-बहन ं से शादी) आम थे, मजससे करीबी पाररवाररक और
सामुदामयक संबंध बनाए रखने में मदद ममलती थी।
क्या मािाएँ महत्वपूणग थी ं?
सातवाहन शासक ं क अक्सर मातृनाम से जाना जाता था, मजसका मतलब है मक उनके नाम उनकी माँ के नाम से आते थे।
उदाहरण के मलए - सातवाहन वंश के शासक, ग तमी-पुत मसरी-सातकमन।
इससे हमें यह पता चलता है की उनके समाज में माताएँ बहुत महत्वपूणण थीं।
वणग व्यवस्था
ब्राह्मण ं ने समाज क चार वणों में बाँ िा।
धमणसूत्र ं और धमणशास्त्र ं में भी इन चार ं वणों के आदशण “कायण” या पेश ं से जुडे मनयम बताए गए हैं।
चार वणों के कायग
धमणसूत्र ं और धमणशास्त्र ं ने बताया मक हर वणण (सामामजक समूह) के ल ग ं क मकस प्रकार का काम करना चामहए।
1. ब्राह्मण – उन्ें वेद ं का अध्ययन और मशिण करना था, धाममणक यज्ञ करना और दू सर ं से करवाना था, तथा दान दे ना और लेना था।
2. क्षतत्रय – उन्ें युद्ध करना, ल ग ं की रिा करना, न्याय करना, वेद ं का अध्ययन करना, यज्ञ करना और दान दे ना था।
3. वैश्य – वे भी वेद ं का अध्ययन, यज्ञ और दान कर सकते थे। इसके अलावा उन्ें खेती करना, पशुपालन करना और व्यापार करना
अपेमित था।
4. शूद्र – उनका एकमात्र कतणव्य था मक वे तीन ं ऊँचे वणों की सेवा करें ।
वणग व्यवस्था लार्ू करने के िरीके
ब्राह्मण ं ने ल ग ं क वणण (जामत) के मनयम ं का पालन करवाने के मलए कई तरीके अपनाए:
1. उन् न ं े कहा मक वणण व्यवस्था ईश्वर द्वारा बनाई गई है, इसमलए ल ग ं क इसे स्वीकार करना चामहए।
2. उन् न ं े राजाओं क आदे श मदया मक वे अपने राज्य में सबक इन जातीय मनयम ं का पालन करवाएँ ।
3. उन् न ं े ल ग ं क यह मवश्वास मदलाया मक उनका सामामजक स्थान जन्म से तय है और उसे बदला नहीं जा सकता।
4. ब्राह्मण ं ने अपने इन दाव ं क सही सामबत करने के मलए ऋग्वेद के एक मंत्र “पुरुर्षसूक्त” का उपय ग मकया।
अक्षतत्रय राजा
शास्त्र ं के अनु सार, केवल िमत्रय ं क ही राजा बनने का अमधकार था।
लेमकन वािमवकता में, कई शासक िमत्रय पररवार ं से नहीं, बस्ति अलग-अलग पृष्ठभूममय ं से आए थे। उदाहरण के मलए -
1. मौयग वंश
उन् न ं े एक मवशाल साम्राज्य पर शासन मकया, लेमकन उनकी उत्पमत्त क लेकर मतभेद थे।
बौद्ध ग्रंथ ं में कहा गया है मक वे िमत्रय थे।
जबमक ब्राह्मण ग्रंथ ं में उन्ें नीच कुल (मनम्न जामत) का बताया गया है।
2. शुंर् और कण्व वंश
मौयों के बाद आए शुंग और कण्व शासक वािव में ब्राह्मण थे, िमत्रय नहीं।
HISTORY BY SACHIN SIR 7290908764
CH 3 - बंधुत्व, जाति और वर्ग
महाभारि की मुख्य कहानी
महाभारत प्राचीन भारत के महान ग्रंथ ं में से एक है।
इसकी मुख्य कहानी द चचेरे भाइय — ं कौरव ं और पांडव ं —के बीच युद्ध पर आधाररत है, ज कुरु वंश के राजकुमार थे।
यह कहनी कौरव ं और पांडव ं के बीच भूमम और सत्ता क लेकर हुए युद्ध का मचत्रण करती है।
इस युद्ध में पां डव ं की जीत हुई।
कुरु वंश की राजधानी: हस्तिनापुर
महाभारि का समाल चनात्मक सं स्करण
महाभारत का समाल चनात्मक संस्करण तैयार करने की प्रमिया 1919 में संस्कृत के प्रमसद्ध मवद्वान वी.एस.सु कथांकर ने शुरू की थी।
अने क मवद्वान ं ने ममलकर महाभारत का समाल चनात्मक संस्करण तैयार करने का मजम्मा उठाया।
पररय जना पर काम करने वाले मवद्वान ं ने सभी पां डुमलमपय ं में पाए जाने वाले श्ल क ं की तुलना करने का एक तरीका मनकाला।
उन् न ं े उन श्ल क ं का चयन मकया ज लगभग सभी पां डुमलमपय ं में पाए गए थे और उनका प्रकाशन 13,000 पन् ं में फैले अने क ग्रंथ खंड ं
में मकया।
इस पररय जना क पूरा करने में 47 साल लगें।
इस प्रमिया से द महत्वपूणण बातें सामने आईं:
1. पहली बाि: संस्कृत की अलग-अलग पां डुमलमपय ं में बहुत-से अंश एक जैसे थे। यह इसमलए पता चला क् मं क पूरे उपमहाद्वीप में—उत्तर
के कश्मीर और ने पाल से लेकर दमिण के केरल और तममलनाडु तक—सभी जगह ं की पां डुमलमपय ं में कई महस्से एक समान ममले।
2. दू सरी बाि: कई सौ वर्षों तक महाभारत क मलखते और पढ़ते समय अलग-अलग िेत्र ं में कुछ मभन्नताएँ भी मवकमसत ह गई थीं। इन
िेत्रीय अंतर क मुख्य पाठ की पादमिप्पमणय ं और पररमशष् ं में रखकर अलग से मदखाया गया। 13,000 पन्न ं में से आधे से ज़्यादा पन्ने इन्ीं
मभन्नताओं का मववरण दे ते हैं।
पररवार और बंधुिा के तलए प्रय र् ह ने वाले शब्द
कुल - संस्कृत ग्रंथ ं में ‘कुल’ शब्द का प्रय ग पररवार के मलए मकया जाता है।
जामत - ‘जामत’ शब्द का प्रय ग बंधुओं या ररश्तेदार ं के बडे समूह के मलए ह ता है।
वंश - मकसी कुल में पीढ़ी दर पीढ़ी जुडे सभी पूवणज एक ही वंश के माने जाते हैं।
पररवार
पररवार ररश्तेदार ं का एक बडा समूह ह ता है। मजनके बीच रक्त का संबंध ह ता है।
परं तु ये ररश्ते हमेशा मसर्फण रक्त संबंध ं पर आधाररत नहीं ह ते। कुछ समाज ं में चचेरे-ममेरे भाई-बहन (cousins) क क़रीबी ररश्तेदार माना
जाता है, जबमक कुछ में ऐसा नहीं ह ता।
तपिृवंतशकिा – इसका अथण है पररवार की वंशावली क मपता से ज डना।
मािृवंतशकिा – इसका अथण है पररवार की वंशावली क माँ की ओर से ज डना।
तववाह के प्रकार
अंितवगवाह : जब शादी अपने ही पररवार या ग त्र में की जाती है।
बतहतवगवाह :जब शादी अपने ग त्र के बाहर की जाती है।
बहुपत्नी प्रथा : जब एक पुरुर्ष की कई पमियाँ ह ती हैं।
बहुपति प्रथा : जब एक स्त्री के कई पमत ह ते हैं।
तववाह के तनयम
ऐसी पाररवाररक व्यवस्था में जहाँ वंश आगे बेिे से चलता था, बेमिय ं के साथ अलग तरह का व्यवहार मकया जाता था। उन्ें पररवार की
संपमत्त या धन पर अमधकार नहीं ममलता था।
यह माना जाता था मक बेमिय ं की शादी अपने ही ररश्तेदारी समूह (कुिु म्ब) में नहीं, बस्ति बाहर करनी चामहए।
इस प्रथा क बमहमवणवाह कहते हैं, मजसका अथण है—अपने पररवार या ग त्र के बाहर मववाह करना।
इसी वजह से, मवशेर्षकर ऊँचे दजे वाले पररवार ं की लडमकय ं पर कार्फी मनयंत्रण रखा जाता था तामक उनकी शादी सही उम्र और सही
व्यस्तक्त से कराई जा सके।
ल ग यह भी मानते थे मक कन्यादान मपता का धाममणक कतणव्य है।
धमगसूत्र / धमगशास्त्र
धमणशास्त्र ं में सामातजक व्यवहार के तनयम मलखे ह ते थे।
इन्ें ब्राह्मण ं ने संस्कृि में मलखा था।
इनका मनमाण ण लगभग 500 ईसा पूवण के आसपास हुआ।
ये मनयम मुख्य रूप से ब्राह्मण ं के मलए बनाए गए थे, लेमकन समाज के अन्य ल ग भी इन्ें मानते थे।
सबसे महत्वपूणण धमणसूत्र मनुस्मृति थी, मजसे लगभग 200 ईसा पूवग से 200 ईस्वी के बीच संकमलत मकया गया था।
मनुस्मृति में आठ प्रकार के तववाह ं का उल्लेख है
मववाह द ल ग ं के बीच एक कानूनी और सामामजक ररश्ता है ज पािण नर के रूप में एक साथ रहने , मजम्मेदाररयां बां िने और जीवन में एक-दू सरे
का साथ दे ने के मलए सहमत ह ते हैं।
तववाह के प्रकार
, ब्रह्म तववाह - इसमें मपता अपनी बेिी की शादी एक य ग्य वर से करता है मजसे वेद ं का ज्ञान ह ।
दै व तववाह: इसमें मपता अपनी बेिी का मववाह मकसी पूजारी या पुर महत से करता हैं।
आर्ग तववाह: इसमें वर वधू के मपता क एक गाय,बैल या उनका ज डा दे कर मववाह करता है।
प्रजापत्य तववाह - इसमें मपता वर से रह वचन लेकर मक वह धमणपूवणक ग्रहस्थ जीवन मनभाएगा, अपनी बेिी उसे सौंप दे ता है।
र्ं धवग तववाह : इसे "प्रेम मववाह" भी कहा जाता है, इसमें एक ज डा पररवार की मंजूरी के मबना आपसी सहममत से शादी करता है।
असु र तववाह: इसमें वर वधू के मपता या अन्य ररश्तेदार ं क धन दे कर वधू क खरीदता है।
राक्षस तववाह - रािस मववाह वह मववाह है मजसमें दु ल्हन क उसके घर से जबरदिी अपहरण करके, उसके पररवार से मारपीि या युद्ध
करने के बाद, दु ल्हन की सहममत के मबना मववाह मकया जाता है।
पैशाच तववाह - इसमें क ई पुरुर्ष स ई हुई, नशे में, मानमसक रूप से असमथण या असहाय स्त्री की सहममत के मबना उससे मववाह कर लेता
है।इसे मववाह का सबसे मनं दनीय और अमान्य रूप माना गया है।
र् त्र प्रणाली
ग त्र पद्धमत एक ब्राह्मणीय पद्धमत हैं।
इसकी शुरुआत लगभग 1000 ईसा पूवण में हुई थी।
प्रत्ये क ग त्र का नाम एक प्राचीन वैमदक ऋमर्ष के नाम पर रखा गया था, और एक ग त्र के सभी सदस् ं क उनका वंशज माना जाता था।
र् त्र प्रणाली के मुख्य तनयम
1. मववाह के बाद ममहलाओं क अपने मपता का ग त्र छ डकर अपने पमत का ग त्र अपनाना पडता था।
2. एक ही ग त्र के ल ग आपस में शादी नहीं कर सकते थे - इस मनयम ने बमहमवणवाह क बढ़ावा मदया।
सािवाहन वंश से उदाहरण
सातवाहन, मजन् न ं े पमिमी भारत और दक्कन पर शासन मकया (दू सरी शताब्दी ईसा पूवण – दू सरी शताब्दी ईस्वी), अपने मशलालेख ं के
माध्यम से महत्वपूणण सबूत दे ते हैं।
कई सातवाहन शासक बहुमववाही थे (उनकी एक से ज़्यादा पमियाँ थीं)।
कुछ रामनय ं के नाम से पता चलता है मक उन् न ं े शादी के बाद भी अपने मपता का ग त्र नाम (जैसे गौतम या वमशष्ठ) रखा, ज ब्राह्मणवादी
मनयम ं के स्तखलाफ था।
कुछ रामनयाँ त एक ही ग त्र की थीं, मजससे पता चलता है मक सजातीय मववाह (ररश्तेदार ं के समूह में शादी) का चलन था।
मनष्कर्षण
इससे पता चलता है मक वािमवक सामामजक प्रथाएँ कभी-कभी ब्राह्मणवादी आदशों से अलग थीं।
कुछ िेत्र ं में, जैसे दमिण भारत में, सजातीय मववाह (ररश्तेदार ं या चचेरे भाई-बहन ं से शादी) आम थे, मजससे करीबी पाररवाररक और
सामुदामयक संबंध बनाए रखने में मदद ममलती थी।
क्या मािाएँ महत्वपूणग थी ं?
सातवाहन शासक ं क अक्सर मातृनाम से जाना जाता था, मजसका मतलब है मक उनके नाम उनकी माँ के नाम से आते थे।
उदाहरण के मलए - सातवाहन वंश के शासक, ग तमी-पुत मसरी-सातकमन।
इससे हमें यह पता चलता है की उनके समाज में माताएँ बहुत महत्वपूणण थीं।
वणग व्यवस्था
ब्राह्मण ं ने समाज क चार वणों में बाँ िा।
धमणसूत्र ं और धमणशास्त्र ं में भी इन चार ं वणों के आदशण “कायण” या पेश ं से जुडे मनयम बताए गए हैं।
चार वणों के कायग
धमणसूत्र ं और धमणशास्त्र ं ने बताया मक हर वणण (सामामजक समूह) के ल ग ं क मकस प्रकार का काम करना चामहए।
1. ब्राह्मण – उन्ें वेद ं का अध्ययन और मशिण करना था, धाममणक यज्ञ करना और दू सर ं से करवाना था, तथा दान दे ना और लेना था।
2. क्षतत्रय – उन्ें युद्ध करना, ल ग ं की रिा करना, न्याय करना, वेद ं का अध्ययन करना, यज्ञ करना और दान दे ना था।
3. वैश्य – वे भी वेद ं का अध्ययन, यज्ञ और दान कर सकते थे। इसके अलावा उन्ें खेती करना, पशुपालन करना और व्यापार करना
अपेमित था।
4. शूद्र – उनका एकमात्र कतणव्य था मक वे तीन ं ऊँचे वणों की सेवा करें ।
वणग व्यवस्था लार्ू करने के िरीके
ब्राह्मण ं ने ल ग ं क वणण (जामत) के मनयम ं का पालन करवाने के मलए कई तरीके अपनाए:
1. उन् न ं े कहा मक वणण व्यवस्था ईश्वर द्वारा बनाई गई है, इसमलए ल ग ं क इसे स्वीकार करना चामहए।
2. उन् न ं े राजाओं क आदे श मदया मक वे अपने राज्य में सबक इन जातीय मनयम ं का पालन करवाएँ ।
3. उन् न ं े ल ग ं क यह मवश्वास मदलाया मक उनका सामामजक स्थान जन्म से तय है और उसे बदला नहीं जा सकता।
4. ब्राह्मण ं ने अपने इन दाव ं क सही सामबत करने के मलए ऋग्वेद के एक मंत्र “पुरुर्षसूक्त” का उपय ग मकया।
अक्षतत्रय राजा
शास्त्र ं के अनु सार, केवल िमत्रय ं क ही राजा बनने का अमधकार था।
लेमकन वािमवकता में, कई शासक िमत्रय पररवार ं से नहीं, बस्ति अलग-अलग पृष्ठभूममय ं से आए थे। उदाहरण के मलए -
1. मौयग वंश
उन् न ं े एक मवशाल साम्राज्य पर शासन मकया, लेमकन उनकी उत्पमत्त क लेकर मतभेद थे।
बौद्ध ग्रंथ ं में कहा गया है मक वे िमत्रय थे।
जबमक ब्राह्मण ग्रंथ ं में उन्ें नीच कुल (मनम्न जामत) का बताया गया है।
2. शुंर् और कण्व वंश
मौयों के बाद आए शुंग और कण्व शासक वािव में ब्राह्मण थे, िमत्रय नहीं।