गुप्त राजवंश
प्राचीन भारत का साम्राज्य (लगभग तीसरी शताब्दी
ई.पू.-575 ई.)
गुप्त राजवंश या गुप्त साम्राज्य (ल. 240/275–550 इस्वी) प्राचीन भारत का एक भारतीय साम्राज्य था। जिसने लगभग
संपूर्ण उत्तर भारत पर शासन किया।[4] इतिहासकारों द्वारा इस अवधि को भारत का स्वर्ण युग माना जाता है।[5][note 1]
मौर्य वंश व शुंग वंश के पतन के बाद दीर्घकाल में हर्ष तक भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं रही। कु षाण एवं
सातवाहनों ने राजनीतिक एकता लाने का प्रयास किया। मौर्योत्तर काल के उपरान्त तीसरी शताब्दी ईस्वी में तीन राजवंशो का
उदय हुआ जिसमें मध्य भारत में नाग शक्ति, दक्षिण में वाकाटक तथा पूर्वी में गुप्त वंश प्रमुख हैं। मौर्य वंश के पतन के पश्चात
नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनः स्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को है।
इस काल की अजन्ता चित्रकला
,गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा
उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का
प्रारम्भिक राज्य आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार में था। गुप्त साम्राज्य
साम्राज्य के पहले शासक चंद्र गुप्त प्रथम थे, जिन्होंने विवाह
द्वारा लिच्छवी के साथ गुप्त को एकजुट किया। उनके पुत्र
प्रसिद्ध समुद्रगुप्त ने विजय के माध्यम से साम्राज्य का
गुप्त साम्राज्य
विस्तार किया। ऐसा लगता है कि उनके अभियानों ने उत्तरी
240 ई.–
और पूर्वी भारत में गुप्त शक्ति का विस्तार किया और मध्य
भारत और गंगा घाटी के कु लीन राजाओं और उन क्षेत्रों को
वस्तुतः समाप्त कर दिया जो तब गुप्त वंश के प्रत्यक्ष
↓ ↓
प्रशासनिक नियंत्रण में आ गए थे । साम्राज्य के तीसरे 550 ई.
शासक चंद्रगुप्त द्वितीय (या विक्रमादित्य, "शौर्य का सूर्य")
उज्जैन तक साम्राज्य का विस्तार करने के लिए मनाया गया,
लेकिन उनका शासनकाल सैन्य विजय की तुलना में
सांस्कृ तिक और बौद्धिक उपलब्धियों से अधिक जुड़ा हुआ
था। उनके उत्तराधिकारी- कु मारागुप्त, स्कं दगुप्त और अन्य -
ने धुनास (हेफ्थालवासियों की एक शाखा) पर आक्रमण के
साथ साम्राज्य के क्रमिक निधन को देखा। 6 वीं शताब्दी के
मध्य तक, जब राजवंश का अंत हुआ, तो राज्य एक छोटे
आकार में घट गया था।
गुप्त वंश की उत्पत्ति अपने चरमोत्कर्ष के समय गुप्त
साम्राज्य
गुप्त सामाज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अन्त में प्रयाग के
निकट कौशाम्बी में हुआ था। जिस प्राचीनतम गुप्त राजा के राजधानी पाटलिपुत्र
बारे में पता चला है वो है श्रीगुप्त। हालांकि प्रभावती गुप्त के
पूना ताम्रपत्र अभिलेख में इसे 'आदिराज' कहकर सम्बोधित
किया गया है। पुराणों में ये कहा गया है कि आरंभिक गुप्त
भाषाएँ संस्कृ त
राजाओं का साम्राज्य गंगा द्रोणी, प्रयाग, साके त (अयोध्या)
तथा मगध में फै ला था। श्रीगुप्त के समय में महाराजा की धार्मिक हिन्दू धर्म
उपाधि सामन्तों को प्रदान की जाती थी, अतः श्रीगुप्त किसी
के अधीन शासक था। प्रसिद्ध इतिहासकार के . पी. समूह बौद्ध धर्म[1]
जायसवाल के अनुसार श्रीगुप्त भारशिवों के अधीन छोटे से
,राज्य प्रयाग का शासक था। चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार
मगध के मृग शिखावन में एक मन्दिर का निर्माण करवाया शासन पूर्ण
था। तथा मन्दिर के व्यय में २४ गाँव को दान दिये थे। चंद्रगुप्त
द्वितीय की बेटी, गुप्त राजकु मारी प्रभावती-गुप्ता के पुणे और राजशाही
रिद्धपुर शिलालेखों में कहा गया है कि वह धारणा गोत्र से
संबंधित थीं।[7][8]
महाराजाधिराज
कु छ इतिहासकार, जैसे कि ए. एस. अल्टेकर ने सिद्धांत दिया
है कि गुप्त मूल रूप से वैश्य थे, क्योंकि कु छ प्राचीन भारतीय
ग्रंथ (जैसे विष्णु पुराण) इसके सदस्यों के लिए "गुप्त" वैश्य
- 240 श्रीगुप्त
वर्ण का उपनाम लिखते हैं।[9][10]
ई–
इस सिद्धांत के आलोचकों का तर्क है कि:
280 ई
गुप्त प्रत्यय गुप्तकाल के
- 319 चन्द्रगुप्त
पहले , बाद और उसके
ई– प्रथम
दौरान कई गैर-वैश्य
335 ई
राजाओं के नाम में
- 540 विष्णुगुप्त
आता है, और इसे गुप्त
ई–
राजाओं के वैश्य होने
550 ई
का ठोस प्रमाण नहीं
ऐतिहासिक प्राचीन
माना जा सकता
युग भारत
है।[11][12][13]
- स्थापित 240 ई.
, - अंत 550 ई.
घटोत्कच
क्षेत्रफल
श्रीगुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच गद्दी पर बैठा। २८० ई.
से 320 ई. तक गुप्त साम्राज्य का शासक बना रहा। वह -400 35,00,000
शाही परिवार का वंशज रहा हो सकता है, प्रभावती गुप्त के
पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में घटोत्कच को गुप्त वंश ईस्वी. [2] ² (13,51,35
का प्रथम राजा बताया गया है,इसका राज्य सम्भवतः मगध
के आस-पास तक ही सीमित था। (शिखर वर्ग मील)
क्षेत्र का
चंद्रगुप्त प्रथम उच्चस्तरीय
सन् ३२० में चन्द्रगुप्त प्रथम अपने पिता घटोत्कच के बाद
अनुमान)
राजा बना। चन्द्रगुप्त गुप्त वंशावली में पहला स्वतन्त्र शासक
था। इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। -440 17,00,000 कि
चंद्रगुप्त ने में लिच्छवि संघ को अपने साम्राज्य में सम्मिलित
कर लिया। इसका शासन काल (320 ई. से 335 ई. तक) ईस्वी. [3] ² (6,56,374 व
था। चंद्रगुप्त ने गुप्त संवत् की स्थापना 319–320 ई. में की
थी। गुप्त संवत् तथा शक संवत् के मध्य 241 वर्षों का अंतर (शिखर मील)
था।
पुराणों तथा हरिषेण लिखित प्रयाग प्रशस्ति से चन्द्रगुप्त
क्षेत्र का
प्रथम के राज्य के विस्तार के विषय में जानकारी मिलती है।
चन्द्रगुप्त ने लिच्छवियों के सहयोग और समर्थन पाने के लिए
निम्न-
उनकी राजकु मारी कु मार देवी के साथ विवाह किया। स्मिथ
के अनुसार इस वैवाहिक सम्बन्ध के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त
अंत
ने लिच्छवियों का राज्य प्राप्त कर लिया तथा मगध उसके
सीमावर्ती क्षेत्र में आ गया। कु मार देवी के साथ विवाह-
अनुमान)
सम्बन्ध करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली राज्य प्राप्त किया।
चन्द्रगुप्त ने जो सिक्के चलाए उसमें चन्द्रगुप्त और कु मारदेवी
प्राचीन भारत का साम्राज्य (लगभग तीसरी शताब्दी
ई.पू.-575 ई.)
गुप्त राजवंश या गुप्त साम्राज्य (ल. 240/275–550 इस्वी) प्राचीन भारत का एक भारतीय साम्राज्य था। जिसने लगभग
संपूर्ण उत्तर भारत पर शासन किया।[4] इतिहासकारों द्वारा इस अवधि को भारत का स्वर्ण युग माना जाता है।[5][note 1]
मौर्य वंश व शुंग वंश के पतन के बाद दीर्घकाल में हर्ष तक भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं रही। कु षाण एवं
सातवाहनों ने राजनीतिक एकता लाने का प्रयास किया। मौर्योत्तर काल के उपरान्त तीसरी शताब्दी ईस्वी में तीन राजवंशो का
उदय हुआ जिसमें मध्य भारत में नाग शक्ति, दक्षिण में वाकाटक तथा पूर्वी में गुप्त वंश प्रमुख हैं। मौर्य वंश के पतन के पश्चात
नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनः स्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को है।
इस काल की अजन्ता चित्रकला
,गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा
उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का
प्रारम्भिक राज्य आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार में था। गुप्त साम्राज्य
साम्राज्य के पहले शासक चंद्र गुप्त प्रथम थे, जिन्होंने विवाह
द्वारा लिच्छवी के साथ गुप्त को एकजुट किया। उनके पुत्र
प्रसिद्ध समुद्रगुप्त ने विजय के माध्यम से साम्राज्य का
गुप्त साम्राज्य
विस्तार किया। ऐसा लगता है कि उनके अभियानों ने उत्तरी
240 ई.–
और पूर्वी भारत में गुप्त शक्ति का विस्तार किया और मध्य
भारत और गंगा घाटी के कु लीन राजाओं और उन क्षेत्रों को
वस्तुतः समाप्त कर दिया जो तब गुप्त वंश के प्रत्यक्ष
↓ ↓
प्रशासनिक नियंत्रण में आ गए थे । साम्राज्य के तीसरे 550 ई.
शासक चंद्रगुप्त द्वितीय (या विक्रमादित्य, "शौर्य का सूर्य")
उज्जैन तक साम्राज्य का विस्तार करने के लिए मनाया गया,
लेकिन उनका शासनकाल सैन्य विजय की तुलना में
सांस्कृ तिक और बौद्धिक उपलब्धियों से अधिक जुड़ा हुआ
था। उनके उत्तराधिकारी- कु मारागुप्त, स्कं दगुप्त और अन्य -
ने धुनास (हेफ्थालवासियों की एक शाखा) पर आक्रमण के
साथ साम्राज्य के क्रमिक निधन को देखा। 6 वीं शताब्दी के
मध्य तक, जब राजवंश का अंत हुआ, तो राज्य एक छोटे
आकार में घट गया था।
गुप्त वंश की उत्पत्ति अपने चरमोत्कर्ष के समय गुप्त
साम्राज्य
गुप्त सामाज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अन्त में प्रयाग के
निकट कौशाम्बी में हुआ था। जिस प्राचीनतम गुप्त राजा के राजधानी पाटलिपुत्र
बारे में पता चला है वो है श्रीगुप्त। हालांकि प्रभावती गुप्त के
पूना ताम्रपत्र अभिलेख में इसे 'आदिराज' कहकर सम्बोधित
किया गया है। पुराणों में ये कहा गया है कि आरंभिक गुप्त
भाषाएँ संस्कृ त
राजाओं का साम्राज्य गंगा द्रोणी, प्रयाग, साके त (अयोध्या)
तथा मगध में फै ला था। श्रीगुप्त के समय में महाराजा की धार्मिक हिन्दू धर्म
उपाधि सामन्तों को प्रदान की जाती थी, अतः श्रीगुप्त किसी
के अधीन शासक था। प्रसिद्ध इतिहासकार के . पी. समूह बौद्ध धर्म[1]
जायसवाल के अनुसार श्रीगुप्त भारशिवों के अधीन छोटे से
,राज्य प्रयाग का शासक था। चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार
मगध के मृग शिखावन में एक मन्दिर का निर्माण करवाया शासन पूर्ण
था। तथा मन्दिर के व्यय में २४ गाँव को दान दिये थे। चंद्रगुप्त
द्वितीय की बेटी, गुप्त राजकु मारी प्रभावती-गुप्ता के पुणे और राजशाही
रिद्धपुर शिलालेखों में कहा गया है कि वह धारणा गोत्र से
संबंधित थीं।[7][8]
महाराजाधिराज
कु छ इतिहासकार, जैसे कि ए. एस. अल्टेकर ने सिद्धांत दिया
है कि गुप्त मूल रूप से वैश्य थे, क्योंकि कु छ प्राचीन भारतीय
ग्रंथ (जैसे विष्णु पुराण) इसके सदस्यों के लिए "गुप्त" वैश्य
- 240 श्रीगुप्त
वर्ण का उपनाम लिखते हैं।[9][10]
ई–
इस सिद्धांत के आलोचकों का तर्क है कि:
280 ई
गुप्त प्रत्यय गुप्तकाल के
- 319 चन्द्रगुप्त
पहले , बाद और उसके
ई– प्रथम
दौरान कई गैर-वैश्य
335 ई
राजाओं के नाम में
- 540 विष्णुगुप्त
आता है, और इसे गुप्त
ई–
राजाओं के वैश्य होने
550 ई
का ठोस प्रमाण नहीं
ऐतिहासिक प्राचीन
माना जा सकता
युग भारत
है।[11][12][13]
- स्थापित 240 ई.
, - अंत 550 ई.
घटोत्कच
क्षेत्रफल
श्रीगुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच गद्दी पर बैठा। २८० ई.
से 320 ई. तक गुप्त साम्राज्य का शासक बना रहा। वह -400 35,00,000
शाही परिवार का वंशज रहा हो सकता है, प्रभावती गुप्त के
पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में घटोत्कच को गुप्त वंश ईस्वी. [2] ² (13,51,35
का प्रथम राजा बताया गया है,इसका राज्य सम्भवतः मगध
के आस-पास तक ही सीमित था। (शिखर वर्ग मील)
क्षेत्र का
चंद्रगुप्त प्रथम उच्चस्तरीय
सन् ३२० में चन्द्रगुप्त प्रथम अपने पिता घटोत्कच के बाद
अनुमान)
राजा बना। चन्द्रगुप्त गुप्त वंशावली में पहला स्वतन्त्र शासक
था। इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। -440 17,00,000 कि
चंद्रगुप्त ने में लिच्छवि संघ को अपने साम्राज्य में सम्मिलित
कर लिया। इसका शासन काल (320 ई. से 335 ई. तक) ईस्वी. [3] ² (6,56,374 व
था। चंद्रगुप्त ने गुप्त संवत् की स्थापना 319–320 ई. में की
थी। गुप्त संवत् तथा शक संवत् के मध्य 241 वर्षों का अंतर (शिखर मील)
था।
पुराणों तथा हरिषेण लिखित प्रयाग प्रशस्ति से चन्द्रगुप्त
क्षेत्र का
प्रथम के राज्य के विस्तार के विषय में जानकारी मिलती है।
चन्द्रगुप्त ने लिच्छवियों के सहयोग और समर्थन पाने के लिए
निम्न-
उनकी राजकु मारी कु मार देवी के साथ विवाह किया। स्मिथ
के अनुसार इस वैवाहिक सम्बन्ध के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त
अंत
ने लिच्छवियों का राज्य प्राप्त कर लिया तथा मगध उसके
सीमावर्ती क्षेत्र में आ गया। कु मार देवी के साथ विवाह-
अनुमान)
सम्बन्ध करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली राज्य प्राप्त किया।
चन्द्रगुप्त ने जो सिक्के चलाए उसमें चन्द्रगुप्त और कु मारदेवी