शिरीष के फू ल
प्रश्न 1.
लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत ( संन्यासी ) की तरह क्यों माना है ? (CBSE-2010)
अथवा
शिरीष को ‘अद्भतु अवधूत’ क्यों कहा गया है ? (CBSE-2014, 2017)
उत्तर:
लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत कहा है। अवधूत वह संन्यासी होता है जो विषय-वासनाओं से ऊपर उठ जाता है ,
सुख-दुख हर स्थिति में सहज भाव से प्रसन्न रहता है तथा फलता-फूलता है। वह कठिन परिस्थितियों में भी जीवन-रस
बनाए रखता है। इसी तरह शिरीष का वृक्ष है। वह भयंकर गरमी, उमस, लू आदि के बीच सरस रहता है। वसंत में वह
लहक उठता है तथा भादों मास तक फलता-फूलता रहता है। उसका पूरा शरीर फूलों से लदा रहता है। उमस से प्राण
उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है , तब भी शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र
प्रचार करता रहता है , वह काल व समय को जीतकर लहलहाता रहता है।
प्रश्न 2.
हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है – प्रस्तुत पीठ के आधार पर
स्पष्ट करें । (सैंपल पेपर-2013) (CBSE-2017)
उत्तर:
परवर्ती कवि ये समझते रहे कि शिरीष के फूलों में सब कुछ कोमल है अर्थात् वह तो कोमलता का आगार हैं लेकिन विवेदी
जी कहते हैं कि शिरीष के फूलों में कोमलता तो होती है लेकिन उनका व्यवहार (फल) बहु त कठोर होता है। अर्थात् वह
हृदय से तो कोमल है किं तु व्यवहार से कठोर है। इसलिए हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार का कठोर होना
अनिवार्य हो जाता है।
, प्रश्न 3.
द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख दी
है। स्पष्ट करें । (CBSE-2008)
उत्तर:
द्रविवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की
सीख दी है। शिरीष का वृक्ष भयंकर गरमी सहता है , फिर भी सरस रहता है। उमस व लू में भी वह फूलों से लदा रहता है।
इसी तरह जीवन में चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ आएँ मनुष्य को सदैव संघर्ष करते रहना चाहिए। उसे हार नहीं माननी
चाहिए। भ्रष्टाचार, अत्याचार, दंगे, लूटपाट के बावजूद उसे निराश नहीं होना चाहिए तथा प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाते
रहना चाहिए।
प्रश्न 4.
हाय, वह अवधूत आज कहाँ है ! ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर दे हबल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की
ओर संकेत किया है। कैसे?
उत्तर:
लेखक कहता है कि आज शिरीष जैसे अवधूत नहीं रहे। जब-जब वह शिरीष को देखता है तब-तब उसके मन में ‘हू क-सी’
उठती है। वह कहता है कि प्रेरणादायी और आत्मविश्वास रखने वाले अब नहीं रहे। अब तो केवल दे ह को प्राथमिकता देने
वाले लोग रह रहे हैं। उनमें आत्मविश्वास बिलकुल नहीं है। वे शरीर को महत्त्व देते हैं , मन को नहीं। इसीलिए लेखक ने
शिरीष के माध्यम से वर्तमान सभ्यता का वर्णन किया है।
प्रश्न 5.
कवि ( साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थित प्रज्ञता और विदग्ध प्रेम का हृदय एक साथ आवश्यक है। ऐसा
विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य कर्म के लिए बहु त ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
प्रश्न 1.
लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत ( संन्यासी ) की तरह क्यों माना है ? (CBSE-2010)
अथवा
शिरीष को ‘अद्भतु अवधूत’ क्यों कहा गया है ? (CBSE-2014, 2017)
उत्तर:
लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत कहा है। अवधूत वह संन्यासी होता है जो विषय-वासनाओं से ऊपर उठ जाता है ,
सुख-दुख हर स्थिति में सहज भाव से प्रसन्न रहता है तथा फलता-फूलता है। वह कठिन परिस्थितियों में भी जीवन-रस
बनाए रखता है। इसी तरह शिरीष का वृक्ष है। वह भयंकर गरमी, उमस, लू आदि के बीच सरस रहता है। वसंत में वह
लहक उठता है तथा भादों मास तक फलता-फूलता रहता है। उसका पूरा शरीर फूलों से लदा रहता है। उमस से प्राण
उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है , तब भी शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र
प्रचार करता रहता है , वह काल व समय को जीतकर लहलहाता रहता है।
प्रश्न 2.
हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है – प्रस्तुत पीठ के आधार पर
स्पष्ट करें । (सैंपल पेपर-2013) (CBSE-2017)
उत्तर:
परवर्ती कवि ये समझते रहे कि शिरीष के फूलों में सब कुछ कोमल है अर्थात् वह तो कोमलता का आगार हैं लेकिन विवेदी
जी कहते हैं कि शिरीष के फूलों में कोमलता तो होती है लेकिन उनका व्यवहार (फल) बहु त कठोर होता है। अर्थात् वह
हृदय से तो कोमल है किं तु व्यवहार से कठोर है। इसलिए हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार का कठोर होना
अनिवार्य हो जाता है।
, प्रश्न 3.
द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख दी
है। स्पष्ट करें । (CBSE-2008)
उत्तर:
द्रविवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की
सीख दी है। शिरीष का वृक्ष भयंकर गरमी सहता है , फिर भी सरस रहता है। उमस व लू में भी वह फूलों से लदा रहता है।
इसी तरह जीवन में चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ आएँ मनुष्य को सदैव संघर्ष करते रहना चाहिए। उसे हार नहीं माननी
चाहिए। भ्रष्टाचार, अत्याचार, दंगे, लूटपाट के बावजूद उसे निराश नहीं होना चाहिए तथा प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाते
रहना चाहिए।
प्रश्न 4.
हाय, वह अवधूत आज कहाँ है ! ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर दे हबल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की
ओर संकेत किया है। कैसे?
उत्तर:
लेखक कहता है कि आज शिरीष जैसे अवधूत नहीं रहे। जब-जब वह शिरीष को देखता है तब-तब उसके मन में ‘हू क-सी’
उठती है। वह कहता है कि प्रेरणादायी और आत्मविश्वास रखने वाले अब नहीं रहे। अब तो केवल दे ह को प्राथमिकता देने
वाले लोग रह रहे हैं। उनमें आत्मविश्वास बिलकुल नहीं है। वे शरीर को महत्त्व देते हैं , मन को नहीं। इसीलिए लेखक ने
शिरीष के माध्यम से वर्तमान सभ्यता का वर्णन किया है।
प्रश्न 5.
कवि ( साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थित प्रज्ञता और विदग्ध प्रेम का हृदय एक साथ आवश्यक है। ऐसा
विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य कर्म के लिए बहु त ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर: