प्रबींध के सिद्धाींत
>>>>> जब किसी शोध, अनसु धं ान तथा अभ्यास िे विश्लेषण िे परिणामस्य जो मार्गदशगि आधािभत
ू सत्य
उभि िि सामने बाते है . से ही ससद्धान्त िहलाते है ।
》》 ससद्धान्तों िे आधाि पि संस्था में िायगित भार्गि मध्य िे ससि िल्याण िि सिते है अवपतु उनिा
प्रयोर् िििे िायग िे विश्िादन में जाने िाली समस्याओं से मक्ु तत पा सिते हैं। उनमेद्िािी पििरिष्य
एिं िैज्ञाननि ढं र् से विचाि िि सिता है । ससद्धान्तों िे आधाि पि शोध औि अनस ु ध
ं ान में सहायता
समलती है या ननयोजन से लेिि ननिण ति िे समस्त िायगिलाप सत्य रूप में ननष्पाददत किए जा
सिती है ।
★प्रबन्ध के सिद्धान्तों की विशेषताएँ /प्रकृतत:
परिितगनशील बाताििण िे अनस ु ाि पिु ाने ससद्धान्ती िे स्थान पि र्ए विज्ञाना जन्म लेते िहते हैं।
अननद्राना परिितगनशील होते है । जब ससद्धानों िी प्रिृनत िो ध्यान में िखिाि , उन्हें विसभन्न
प्रिन्धिीय िायों में लार्ू किया जाएर्ा तो ििे साथ प्रबन्धिों िा मार्गदशगन किया जा सिता है
नतशील एिं
1 सिद्धाना गततशील होते है (Principles are dynamic)
मािी अनम
ु ान नए ससद्धान्तों िो जन्म दे ते हैं। निीन ससद्धान्तों िी आधाि पि व्यिसाय िो नई
ददशा समलती है ।
2. िािवभौसिक है (Universal)
प्रदत्य िे विद्िाना व्यिसाकिनीनति धमगसस् ं थाओं ने अपनाए जा सिते है तथा इन्हें तभी िाष्री में
अपनाया जा शतता है । यह अिश्य है कि नीनत िचत िी संस्िृनत तथा आर्थगि सामाक्जि वििास तथा
व्यक्तत औि समह ू कि सोच ससद्धांत िो प्रभावित किए बबना नहीं िहती है ।
3नीततयों और तनयिों िे सभन्न होते है —
ससद्धानः िायों औि विचािों िे मार्गदशगि होते है . जबकि नीनतयों औि ननयमों िे आधाि पि ननणगय
सलये जाते है तथा नीनतयों ससद्धान्तों िे आधाि पि ननधागरित िी जाती है ।
इाससलए ससद्धान्त, नीनतयों औि ननयमों में पिस्पि अन्ति पाया जाता है ।
4. लोचशील है न कक कठोर
नशीनिी फयो िो ाात मत है कि प्रिना िे ससद्धानों िी विसभन्न परिक्स्थनतयों िे अनस
ु ाि परििनतगत
किया एिता है । इनहीं िहा जा सिता है तयोंकि ये ससद्धान्त अर्धिारियों औि अधीनस्थों िी चतिु ाई
सशिा योग्यता िायगऔि श्रेष्ठ सा पि ननभगि ििते है ।
5. सिद्धान्त पर्
ू व नह ीं होते (Principles are inexact)
प्रबन्ध िे ससद्धान्त िई बाि एि समान परिक्स्थनतया होते हुए भी अलर्-अलर् समयों पि सभन्न-
सभन्न परिणाम दे सिते है । ग्राहिहना उर्चत नहीं होर्ा कि प्रदना िे ससद्धान्त सही जर्ह पण
ू रू
ग प से
सही औि सटीि ही ससद्ध होंर्े।
6. प्रबन्ध कौशल िे सभन्नता (Defferent from management know-how)
एि ओि प्रबन्धिीय िौशल, प्रबन्धिीय ज्ञान िी ननर्ध है जबकि प्रबन्ध िे ससद्धान्त इस ज्ञान िा
मार्गदशगन ििने में सहयोर् ििते है ।
>>>>> अतः उपिोतत तथ्यों िे आधाि पि यह िहा जा सिता है कि 'प्रबन्ध िे ससद्धान्त लिीले है न कि
िठोि। यद्यवप, इन्हें विसभन्न तिग दे ते हुए िई तथ्यों से सभन्च बताया र्या है । यह सभन्नता िेिल
िायग संपन्न ििते हुए तो हो सिती है पिन्तु मानिीय व्यिापि िे िािण संर्ठन िे िायग से
ससद्धान्तों िा मेल-समलाप अिश्य होता है ।
, प्रबन्ध के लसद्धान्ि: महत्व/उपयोधगिा/िाम/आवश्यकिा
( Importance/Utility/Advantages/Need of Management Principles)
प्रबन्ध के सिद्धान्तों के आधार पर ही प्रबन्धक वर्ग िंस्था का भववष्य निधागररत कर िकता है तथा
कर्गचारी वर्ग की कायग कुशलता को बढावा दे िकता है । प्रबंध के सिद्धान्तों का प्रबंधकों के सलए
ववशेष र्हत्व है। इि सिद्धान्तों के आधार पर प्रबंधक अपिी ककयाओं को िहज एवं व्यवस्स्थत रूप
िे िम्पाददत कर लेता है।" प्रबंधको के सलए प्रबंध के सिद्धान्त की आवश्यकता एवं र्हत्व को निम्ि
शीषगक र्ें बतलाया र्या है -
1. प्रबंध की प्रकृति के स्पष्टीकरण के लिए
प्रबंध के सिद्धान्त की जािकारी के अभाव र्ें प्रबंधकों को प्रबंधकीय कायों का ववश्लेषण र्ें कदििाई
का िार्िा करिा पड़ता है। उन्हें अपिे कायग त्रदु ि एवं िध
ु ार के आधार पर करिे होते है लेककि पणू ग
ववकसित प्रबंध के सिद्धान्त प्रबंधको को प्रबंध के कायों की प्रकृनत को भलीभानत िर्झिे र्ें
िहायता करते है ।
2. संसाधनो में समन्वय के लिए
िंर्िि के भौनतक एवं र्ािवीय िंिाधिो के र्ध्य िर्न्वय स्थावपत करिा अनत आवश्यक है ।
प्रबंध की सिद्धान्त इि िंिाधिो के र्ध्य िर्न्वय की स्थापिा करते है और िीसर्त िंिाधिों का
अधधकतर् िदप ु योर् करिे र्ें िहायता करते है । िंिाधिों के अपव्यय को रोकिे र्ें भी प्रबंध के
सिद्धान्त र्हत्वपण ू ग भसू र्का अदा करते है ।
3 प्रबंधकीय काययकुशििा में वद्
ृ धध के लिए
प्रबंध के सिद्धान्त एवं प्रबंध की ववसभन्ि तक्िीक ववसभन्ि पररनिनतक ककयाओं के िंचालि र्ें
प्रधयों का र्ार्गदशगि करती है। इिी प्रबंधकों की कायगकुशता र्ें वद्
ृ धध होती है । प्रबंध के
4.सामाजिक सक्ष्यों की प्रालश के लिए–
िार्ास्जक लक्ष्यों की प्रास्तत र्ें प्रका के सिद्धािों की ववशेष भसू र्का है । इि सिद्धािों के आधार
प्रबंधक भौनतक एवं र्ािवीय िंिाधिों र्ें िर्न्वय स्थावपत कर उिका कुशलतापव ू क
ग उपयोर् कर
िकता है। इििे िर्ाज के अधधवितर् िंतस्ु ष्ि एवं उच्च जीवि स्तर उपलब्ध होता है । ग्राहकों की
आवश्यकताओं की पनू तग होती है और कर्गवाररयों को अधधका पाररश्रसर्क प्रातत होता है ।
5. प्रबंधकों के प्रलशक्षण के लिए–
प्रबंधको को प्रसशक्षित करिे र्ें भी धक्य के सिद्धान्त र्हत्वपण ू ग भसू र्का अदा करते है । इि
सिद्धान्तों के प्रयोर् िे प्रबंधक प्रसशिण िार्ग्री एवं प्रभावशाली ववकसित कर लेते हैं। अन्यथा उन्हें
त्रदु ि एवं िध
ु ार ववधधयों पर निभगर रहिा पड़ता है ।
6. िटटि रागस्याओं के समाधान के लिए
वैधीवरण दौर र्ें व्याविानयक जर्तु र्ें िर्स्यायें बढती जा रही है । इि जदिल िर्स्याओं के
िर्ाधाि र्ें प्रबंध के सिद्धान्त योर्दाि दे िकते है थे व्यविाय के र्नतशील वातावरण एवं उिके
प्रभावों को िर्झिे र्ें र्दद करते
7 शोध में सध
ु ार के लिए–
प्रबंध के सिद्धान्तों का प्रयोर् करके प्रबंध ज्ञाि के ववकाि के सलए शोध कायग र्ें िध
ु ार कर िकते है ।
यही कारण है कक प्रत्येक वषग हजारों प्रबंध-ववद्याथी प्रबंध की ववसभन्ि पररकल्पिाओं की वैधता की
जांच के सलए शोध कायग हाथ र्ें लेते है और प्रबंध के सिद्धान्तों के िहारे शोध कायग को पण ू ग करते है ।
>>>>> जब किसी शोध, अनसु धं ान तथा अभ्यास िे विश्लेषण िे परिणामस्य जो मार्गदशगि आधािभत
ू सत्य
उभि िि सामने बाते है . से ही ससद्धान्त िहलाते है ।
》》 ससद्धान्तों िे आधाि पि संस्था में िायगित भार्गि मध्य िे ससि िल्याण िि सिते है अवपतु उनिा
प्रयोर् िििे िायग िे विश्िादन में जाने िाली समस्याओं से मक्ु तत पा सिते हैं। उनमेद्िािी पििरिष्य
एिं िैज्ञाननि ढं र् से विचाि िि सिता है । ससद्धान्तों िे आधाि पि शोध औि अनस ु ध
ं ान में सहायता
समलती है या ननयोजन से लेिि ननिण ति िे समस्त िायगिलाप सत्य रूप में ननष्पाददत किए जा
सिती है ।
★प्रबन्ध के सिद्धान्तों की विशेषताएँ /प्रकृतत:
परिितगनशील बाताििण िे अनस ु ाि पिु ाने ससद्धान्ती िे स्थान पि र्ए विज्ञाना जन्म लेते िहते हैं।
अननद्राना परिितगनशील होते है । जब ससद्धानों िी प्रिृनत िो ध्यान में िखिाि , उन्हें विसभन्न
प्रिन्धिीय िायों में लार्ू किया जाएर्ा तो ििे साथ प्रबन्धिों िा मार्गदशगन किया जा सिता है
नतशील एिं
1 सिद्धाना गततशील होते है (Principles are dynamic)
मािी अनम
ु ान नए ससद्धान्तों िो जन्म दे ते हैं। निीन ससद्धान्तों िी आधाि पि व्यिसाय िो नई
ददशा समलती है ।
2. िािवभौसिक है (Universal)
प्रदत्य िे विद्िाना व्यिसाकिनीनति धमगसस् ं थाओं ने अपनाए जा सिते है तथा इन्हें तभी िाष्री में
अपनाया जा शतता है । यह अिश्य है कि नीनत िचत िी संस्िृनत तथा आर्थगि सामाक्जि वििास तथा
व्यक्तत औि समह ू कि सोच ससद्धांत िो प्रभावित किए बबना नहीं िहती है ।
3नीततयों और तनयिों िे सभन्न होते है —
ससद्धानः िायों औि विचािों िे मार्गदशगि होते है . जबकि नीनतयों औि ननयमों िे आधाि पि ननणगय
सलये जाते है तथा नीनतयों ससद्धान्तों िे आधाि पि ननधागरित िी जाती है ।
इाससलए ससद्धान्त, नीनतयों औि ननयमों में पिस्पि अन्ति पाया जाता है ।
4. लोचशील है न कक कठोर
नशीनिी फयो िो ाात मत है कि प्रिना िे ससद्धानों िी विसभन्न परिक्स्थनतयों िे अनस
ु ाि परििनतगत
किया एिता है । इनहीं िहा जा सिता है तयोंकि ये ससद्धान्त अर्धिारियों औि अधीनस्थों िी चतिु ाई
सशिा योग्यता िायगऔि श्रेष्ठ सा पि ननभगि ििते है ।
5. सिद्धान्त पर्
ू व नह ीं होते (Principles are inexact)
प्रबन्ध िे ससद्धान्त िई बाि एि समान परिक्स्थनतया होते हुए भी अलर्-अलर् समयों पि सभन्न-
सभन्न परिणाम दे सिते है । ग्राहिहना उर्चत नहीं होर्ा कि प्रदना िे ससद्धान्त सही जर्ह पण
ू रू
ग प से
सही औि सटीि ही ससद्ध होंर्े।
6. प्रबन्ध कौशल िे सभन्नता (Defferent from management know-how)
एि ओि प्रबन्धिीय िौशल, प्रबन्धिीय ज्ञान िी ननर्ध है जबकि प्रबन्ध िे ससद्धान्त इस ज्ञान िा
मार्गदशगन ििने में सहयोर् ििते है ।
>>>>> अतः उपिोतत तथ्यों िे आधाि पि यह िहा जा सिता है कि 'प्रबन्ध िे ससद्धान्त लिीले है न कि
िठोि। यद्यवप, इन्हें विसभन्न तिग दे ते हुए िई तथ्यों से सभन्च बताया र्या है । यह सभन्नता िेिल
िायग संपन्न ििते हुए तो हो सिती है पिन्तु मानिीय व्यिापि िे िािण संर्ठन िे िायग से
ससद्धान्तों िा मेल-समलाप अिश्य होता है ।
, प्रबन्ध के लसद्धान्ि: महत्व/उपयोधगिा/िाम/आवश्यकिा
( Importance/Utility/Advantages/Need of Management Principles)
प्रबन्ध के सिद्धान्तों के आधार पर ही प्रबन्धक वर्ग िंस्था का भववष्य निधागररत कर िकता है तथा
कर्गचारी वर्ग की कायग कुशलता को बढावा दे िकता है । प्रबंध के सिद्धान्तों का प्रबंधकों के सलए
ववशेष र्हत्व है। इि सिद्धान्तों के आधार पर प्रबंधक अपिी ककयाओं को िहज एवं व्यवस्स्थत रूप
िे िम्पाददत कर लेता है।" प्रबंधको के सलए प्रबंध के सिद्धान्त की आवश्यकता एवं र्हत्व को निम्ि
शीषगक र्ें बतलाया र्या है -
1. प्रबंध की प्रकृति के स्पष्टीकरण के लिए
प्रबंध के सिद्धान्त की जािकारी के अभाव र्ें प्रबंधकों को प्रबंधकीय कायों का ववश्लेषण र्ें कदििाई
का िार्िा करिा पड़ता है। उन्हें अपिे कायग त्रदु ि एवं िध
ु ार के आधार पर करिे होते है लेककि पणू ग
ववकसित प्रबंध के सिद्धान्त प्रबंधको को प्रबंध के कायों की प्रकृनत को भलीभानत िर्झिे र्ें
िहायता करते है ।
2. संसाधनो में समन्वय के लिए
िंर्िि के भौनतक एवं र्ािवीय िंिाधिो के र्ध्य िर्न्वय स्थावपत करिा अनत आवश्यक है ।
प्रबंध की सिद्धान्त इि िंिाधिो के र्ध्य िर्न्वय की स्थापिा करते है और िीसर्त िंिाधिों का
अधधकतर् िदप ु योर् करिे र्ें िहायता करते है । िंिाधिों के अपव्यय को रोकिे र्ें भी प्रबंध के
सिद्धान्त र्हत्वपण ू ग भसू र्का अदा करते है ।
3 प्रबंधकीय काययकुशििा में वद्
ृ धध के लिए
प्रबंध के सिद्धान्त एवं प्रबंध की ववसभन्ि तक्िीक ववसभन्ि पररनिनतक ककयाओं के िंचालि र्ें
प्रधयों का र्ार्गदशगि करती है। इिी प्रबंधकों की कायगकुशता र्ें वद्
ृ धध होती है । प्रबंध के
4.सामाजिक सक्ष्यों की प्रालश के लिए–
िार्ास्जक लक्ष्यों की प्रास्तत र्ें प्रका के सिद्धािों की ववशेष भसू र्का है । इि सिद्धािों के आधार
प्रबंधक भौनतक एवं र्ािवीय िंिाधिों र्ें िर्न्वय स्थावपत कर उिका कुशलतापव ू क
ग उपयोर् कर
िकता है। इििे िर्ाज के अधधवितर् िंतस्ु ष्ि एवं उच्च जीवि स्तर उपलब्ध होता है । ग्राहकों की
आवश्यकताओं की पनू तग होती है और कर्गवाररयों को अधधका पाररश्रसर्क प्रातत होता है ।
5. प्रबंधकों के प्रलशक्षण के लिए–
प्रबंधको को प्रसशक्षित करिे र्ें भी धक्य के सिद्धान्त र्हत्वपण ू ग भसू र्का अदा करते है । इि
सिद्धान्तों के प्रयोर् िे प्रबंधक प्रसशिण िार्ग्री एवं प्रभावशाली ववकसित कर लेते हैं। अन्यथा उन्हें
त्रदु ि एवं िध
ु ार ववधधयों पर निभगर रहिा पड़ता है ।
6. िटटि रागस्याओं के समाधान के लिए
वैधीवरण दौर र्ें व्याविानयक जर्तु र्ें िर्स्यायें बढती जा रही है । इि जदिल िर्स्याओं के
िर्ाधाि र्ें प्रबंध के सिद्धान्त योर्दाि दे िकते है थे व्यविाय के र्नतशील वातावरण एवं उिके
प्रभावों को िर्झिे र्ें र्दद करते
7 शोध में सध
ु ार के लिए–
प्रबंध के सिद्धान्तों का प्रयोर् करके प्रबंध ज्ञाि के ववकाि के सलए शोध कायग र्ें िध
ु ार कर िकते है ।
यही कारण है कक प्रत्येक वषग हजारों प्रबंध-ववद्याथी प्रबंध की ववसभन्ि पररकल्पिाओं की वैधता की
जांच के सलए शोध कायग हाथ र्ें लेते है और प्रबंध के सिद्धान्तों के िहारे शोध कायग को पण ू ग करते है ।