प Chapter 7 तोड़ती प थर (सूयकांत ि पाठी िनराला)
तोड़ती प थर पाठ्य पु तक के एवं उनके उ र
1.
प थर तोड़नेवाली ी का प रचय किव ने िकस तरह िकया है?
उ र-
तोड़ती प थर वाली मजदू रन एक साँवली कसे बदन वाली यवु ती है। वह िचलिचलाती गम क धपू म हथौड़े से
इलाहाबाद क सड़क के िकनार एक छायाहीन वृ के नीच प थर तोड़ रही है। उसके माथे से पसीने क बदूं े दल
ु क रही ह।
मजदू रन अपने म-सा य काम म पूण त मयता से य त है।
2.
याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, ि य-कम-रत मन’
िनराला ने प थर तोड़ने वाली ी का ऐसा अक ं न य िकया है? आपके िवचार से ऐसा िलखने क या साथकता है?
उ र-
सयू का त ि पाठी ‘िनराला’ ने अपनी ‘तोड़ती प थर’ शीषक किवता म एक मजदरू नी के प एवं काय का िच ण िकया
है, जो साँवली और जवान है तथा आँखे नीचे झकु ाए पणू त मयता एवं िन ा से अपने काय म य त है।
किव ने उ प थर वाली ी के िवषय म इस कार िच इसिलए ततु िकया है िक प थर तोड़ने जैसे किठन का को
स पािदत करने के िलए सगु िठत व थ शरीर को होना िनता त आव यक है तथा सगु िठत शरीर ही मसा य काय हेतु
स म होता है। साथ ही ती ण धपू म शरीर का साँवला होना वाभािवक है। किव ने काय म उसक पूण त मयता का भी
सु दर िच ण िकया है। मेरे िवचार से ऐसा िलखना सवथा उिचत है।
3.
ी अपने गु हथौड़े से िकस पर हार कर रही है।
उ र-
ी (मजदू रन) अपने बड़े हथौड़े से समाज क आिथक िवषमता पर हार कर रही है। वह धपू क झल ु साने वाली भीषण
गम के क दायक प रवेश मे प थर तोड़ने का काय कर रही है। उसके सामने ही अमीर को सखु -सिु वधा दान करने
वाली िवशाल अ ािलकाएँ खड़ी ह जो उसक गरीबी पर यं य करती तीत होती ह। एक ओर उस ी के मािमक तथा
कठोर सघं ष क यथा-कथा है, दसू री ओर अमीर क िवशाल अ ािलकाओ ं एवं सख ु सिु वधाओ ं का िच ण है।
इस कार ततु पिं देश क आिथक िवषमता का सजीव िच ण है। इसके साथ ही इस िवषमता पर एक चभु ता यं य
भी है।
4.
किव को अपनी ओर देखते हए देखकर ी सामने खड़े भवन क ओर देखने लगती है, ऐसा य ?
उ र-
किव को अपनी ओर देखते हए देखकर ी सामने खड़े भवन क ओर देखने लगती है। वह प थर तोड़ना बदं कर देती है।
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, वह सामने खड़े िवशाल भवन क ओर देखने लगती है। ऐसा कर वह समाज म या आिथक िवषमता क ओर संकेत
करती है। किव उसके भाव को समझ जाता है।
5.
‘िछ नतार’ का या अथ है? किवता के संदभ म प कर।
उ र-
किववर सयू का त ि पाठी िनराला ने ‘तोड़ती प थर’ शीषक किवता म प थर तोड़ने वाली गरीब मजदरू नी क मािमक एवं
दा ण ि थित का यथाथ वणन ततु िकया है। किव प थर तोड़ती मजदरू नी को सहानभु ूितपणू ि से देखता है। वह भी
किव को एक ण के िलए देखती है। वह सामने के भ य भवन को भी देख लेती है और िफर अपने काय म लग जाती है।
उसक िववशता ऐसी है मान कोई यि मार खाकर भी न रोए। वह चाहकर भी अपनी यथा और िववशता किव क
दय-वीणा के तार को िछ न-िभ न कर देती है।
6.
‘देखकर कोई नह
देखा मझु े उस ि से
जो मार खा रोई नह ,
इन पिं य का मम उ ािटत कर।
उ र-
ततु पिं याँ महा ाण “िनराला’ रिचत ‘तोड़ती प थर’ किवता से उ त ह। इन पिं य म किव ने शोषण और दमन पर
पलती यव था के अ याय और वंचनापणू यहू म िपसती हई प थर तोड़ने वाली गरीब मजदरू नी का मािमक ि थित को
वणन िकया है। किव प थर तोड़ती मजदरू नी पर सहानभु ूित पूण नजर डालता है। वह भी एक िणक ि से किव क ओर
देखकर अपने काम म इस कार म न हो जाती है जैसे उसने किव को देखा ही नह ।
वह सामने िवशाल अ ािलका पर भी नजर डालकर समाज म या अमीरी-गरीबी क खाई से भी किव को -ब
कराती है। उसक नजर म सघं षपणू दीन-हीन जीवन का अ स सहज ही ि गोचर होता है। उसक िववशता ऐसी है
मानो कोई मार खाकर भी न रोए। सामािजक िवषमता का दश
ं मक
ू होकर सहने को गरीब मजदरू नी अिभश है।
7.
सजा सहज िसतार सनु ी मने वह नही जो थी सनु ी झक
ं ार’ यहाँ िकस िसतार क ओर सक
ं े त है? इन पिं य का भाव प
कर।
उ र-
ततु पंि याँ किववर ‘िनराला’ रिचत ‘तोड़ती प थर’ किवता क ह। किव इलाहाबाद के जनपथ पर भीषण गम म
प थर तोड़ती मजदरू नी को देखता है। वह भी िववश ि से किव को एक ण के िलए चपु चाप देख लेती है। िफर, अपने
काय म लग जाती है। वह कुछ बोलती नह , िफर भी किव उसके दय िसतार से झंकृत वेदना क मािमकता को समझ ही
लेता है।
किव मजदरू नी के दय िसतार से झक
ं ृ त वेदना जो सामािजक िवषमता क कहानी कहती हई तीत होती है, को दशाना
चाहता है। किव सहज अपने दय के वीणा के तार से उस शोषण क ितमिू त मजदरू नी के दय के तार से जोड़कर
उसके दा ण- यथा क अनभु िू त कर लेता है।
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