HINDI
1. िह ी गध – सािह के इितहास पर आधा रत ो र– { 5 अंक }
2. िह ी का – सािह के इितहास पर आधा रत ो र – { 5 अंक }
नोट – 1 व 2 को ंय अपने पा पु क से याद करे , **कम से कम 1000 याद करे ।
.
3. िह ी गधांश पर आधा रत के उ र दीिजए – { 10 अं क }
नोट – केवल िन तीन पाठों का अ यन कर –
I. रा का प ( िनब ) – डॉ० वासुदेवशरण अ वाल
II. अशोक के फूल ( िनब ) – डॉ० हजारी साद ि वेदी
III. भाषा और आधुिनकता ( िनब ) – ो० जी० सु र रे ी
4. िह ी पधांश पर आधा रत के उ र दीिजए – { 10 अंक }
नोट – केवल िन चार पाठों का अ यन कर –
IV. पवन दू ितका – अयो ािसंह उपा ाय ‘हरीऔध’
V. कैकयी का अनुताप , गीत – मै िथलीशरण गु
VI. ा-मनु , गीत – जयशंकर साद
VII. नौका िवहार , बापू के ित , प रवतन – सुिम ान न पंत
.
5. िह ी गध लेखक के सािह क प रचय दे ते ए उनकी मु ख रचनाएँ िल खए – { 5 अंक }
डॉ० वासुदेवशरण अ वाल का सािह क प रचय
जीवन प रचय – डॉ० वासुदेवशरण अ वाल का ज सन् 1904 ई० म मे रठ जनपद के खेड़ा नामक ाम म आ था। इनके माता-
िपता लखनऊ म रहते थे , अत: इनका बा काल लखनऊ म ही तीत आ । यही से इ ोने अपनी ार क िश ा ा की । इ ोने
‘काशी िह दू िव िवधालय‘ से एम० ए० की परी ा उतीण की तथा डी० िलट् ० की उपािध भी ा की । इ ोने पािल , सं ृ त , अं ेजी
आिद भाषयों तथा ाचीन भारतीय सं ृ ित और पुरात का गहन अ यन िकया । सन् 1967 ई० म अ वाल जी का गवास हो गया।
.
सािह क प रचय – डॉ० वासुदेवशरण अ वाल लखनऊ और मथुरा के पुरात सं हालयों म िनरी क, के ीय पुरात िवभाग
के संचालक और रा ीय सं हालयों, िद ी के अ रहे । कुछ समय तक अ वाल जी ‘काशी िह दू िव िवधालय’ म इ ोलोंजी
िवभाग के अ भी रहे । इ ोने ागैितहािसक, वैिदक तथा पौरािणक सािह का मम उद् घाटन भी िकया। अ वाल जी ने मु प
से पु रात को ही अपना िवषय बनाया। डॉ० वासुदेवशरण अ वाल अनुस ता, िनब कार और संपादक के प म भी िति त थे ।
.
भाषा शै ली – डॉ० वासुदेवशरण अ वाल की भाषा शु , सािह क, सं ृ तिन खड़ीबोली है । शैली के प म इ ोने े षा क ,
ा ा क एवं उ दरण शैिलयों को मु ख प से योग िकया है ।
कृितयाँ –
1. िनब सं ह – कला और सं ृ ित, पृ ी-पु , क वृ , माता-भू िम, वा ारा आिद ।
2. शोध – पािणिनकालीन भारत । 3. स ादन – प ावत, हषच रत, पािल आिद ।
Imp. डॉ० हजारी साद ि वेदी का सािह क प रचय
जीवन प रचय – आचाय हजारी साद ि वेदी जी का ज सन् 1907 ई० म बिलया िजले के ‘दु बे का छपरा’ नामक ाम म आ था ।
इनके िपता का नाम अनमोल ि वेदी तथा माता का नाम ोितकली दे वी था । ि वेदी जी ने अपनी ार क िश ा बिलया िजले के
िमिडल ू ल से ा की । इ ोने िह ी एवं सं ृ त भाषाओं का गहन अ यन िकया । 19 मई, सन् 1979 ई० म ये महान सािह कार
रोग श ा पर ही िचरिन ा म सो गया ।
,सािह क प रचय – डॉ० हजारी साद ि वेदी िह ी-सािह के ात िनब कार, आलोचक, स ादक, उप ासकार के अित र
एक कुशल व ा एवं सफल अ ापक के प म हमारे स ुख आते है । सन् 1949 ई० म ‘लखनऊ िव िवधालय‘ ने इ ‘डी० िलट् ०’ की
मानद उपािध से स ािनत िकया तथा सन् 1957 ई० म भारत सरकार ने इ े ‘प -भूषण’ की उपािध से िवभूिषत िकया । इनकी रचनाओं म
नवीनता और ाचीनता दोनों का सम िमलता है । इ ोने ‘अिभनव भारतीय’ तथा ‘िव भारती’ नामक का स ादन िकया। िह ी के
लिलत िनब को व थत प दान करने वाले िनब कारों म हजारी साद ि वेदी जी अ णी है ।
भाषा शैली – ि वेदी जी की भाषा शु , सािह क, प र ृ त, सं ृ त-िन खड़ीबोली है । इनकी रचनाओं म गवेषणा क, िवचारा क,
आलोचना क, भावा क आिद शैिलयों के दशन होते है ।
कृितयाँ – हजारी साद ि वेदी ;--
1. िनब -सं ह – अशोक के फूल, क लता, िवचार और िवतक आिद । िनब - कुटज, आलोक पव
2. उप ास – पुननवा, अनामदास का पोथा, बाणभ की आ कथा आिद ।
काल – छायावादो र युग
3. आलोचना – सुर-सािह , सािह -सहचर आिद । 4. इितहास – िह ी सािह का इितहास ।
. Imp. ो० जी० सु र रे ी का सािह क प रचय
जीवन प रचय – ो० जी० सु र रे ी जी का ज सन् 1919 ई० म आं दे श के बे ूर जनपद के ब ुलप नामक ाम मे आ
था। ो० जी० सु र रे ी आं दे श िव िवधालय म िह ी िवभाग के अ रहे । इनकी ार क िश ा सं ृ त एवं तेलुगु भाषा म ई।
रे ी जी आं दे श िव िवधालय म ातको र अ यन एवं अनु संधान िवभाग के अ भी रहे । इनके िनदशन म ‘िह ी और तेलुगु : एक
तुलना क अ यन’ ंथ पर शोध काय भी आ । इनका िनधन सन् 2005 ई० म हो गया ।
सािह क प रचय – अिह ी दे श के िनवासी होते ए भी ो० जी० सु र रे ी जी ने िह ी भाषा पर अ ा अिधकार ा कर
िलया था। रा वादी िह ी चारक, ात सािह कार एवं तुलना क सािह के मूध समी क, े िवचारक, समालोचक एवं
िनब कार सु र रे ी दि ण भारतीयो के िलए िह ी और उ र भारतीयो के िलए दि णी भाषायों के अ यन की ेरणा दी है । इ ोने
िह ी भािषयों के िलए तिमल, तेलुगु, क ड़ और मलयालम सािह की रचना की है । इनके अनेक िनब िह ी, अं ेजी एवं तेलुगु
प -पि काओं म कािशत ए। िह ी भाषी न होते भी रे ी जी ने िह ी को अपनी रचनाओं के प म जो अमू िनिध सौंपी है , उसके
िलए िह ी सािह सदै व ऋणी रहे गा ।
कृितयाँ – नोट – िह ी के िलए बे
सािह और समाज िह ी और तेलुगु : एक तुलना क अ यन यू ूब चैनल का नाम है -
मे रे िवचार दि ण की भाषाएँ और उनका सािह “Gyansiddu Classes”
वैचा रकी, शोध और बोध ल ेज ॉ म इन इ या ( स ािदत अं ेजी ंथ )
.
.
ह रशं कर परसाई का सािह क प रचय
जीवन प रचय – ह रशंकर परसाई जी का ज 22 अग , सन् 1922 ई० म म दे श के होशंगाबाद िजले के जमानी नामक थान
म आ था। इनकी ार क िश ा म दे श म ई । इ ोने ‘नागपुर िव िवधालय’ से एम० ए० की िड ी ा की तथा कुछ समय
तक अ ापन-काय िकया । िक ु सािह म िवशे ष िच होने के कारण अ ापन काय छोड़कर पूण प से लेखन-काय म लग गए
और सािह -सेवा म जु ट गए। 10 अग , सन् 1995 ई० को ह रशंकर परसाई जी का दे हा हो गया ।
सािह क प रचय – ह रशंकर परसाई जी एक अ े िनब कार थे। सािह -सेवा के िलए इ ोने अपनी नौकरी को भी ाग िदया।
वष तक आिथक िवषमताओं को झे लते ए भी इ ोने ‘वसुधा’ नामक सािह क मािसक पि का का स ादन व काशन करते रहे।
सामािजक िवसंगितयों और गत दोषों को िनरावरण करने वाले ंगा क िनब ो के अित र परसाई जी ने कहािनयाँ और उप ास
भी िलखे ह। समय की कमजो रयों एवं राजनीित के फरे बों पर करारे ं िलखने मे ये िस दह थे।
भाषा शै ली – ह रशंकर परसाई की भाषा शु सािह क, प र ृ त खड़ीबोली है । इनकी रचनाओं म िवचारा क, गवेषणा क,
ा क, ं ा क आिद शै िलयों के दशन होते है ।
, कृितयाँ -
कहानी- सं ह – हँ सते है , रोते है , जै से उनके िदन िफर ।
उप ास – रानी नागफनी की कहानी , तट की खोज ।
िनब -सं ह – तब की बात और थी , िशकायत मु झे भी है , बेईमान की परत ।
. .
6. िह ी पध ले खक के सािह क प रचय दे ते ए उनकी मुख रचनाएँ िल खए – { 5 अंक }
अयो ािसंह उपा ाय ‘ह रऔध’ का सािह क प रचय
जीवन प रचय – अयो ािसंह उपा ाय ‘ह रऔध’ जी का ज सन् 1865 ई० म उ र दे श रा के आजमगढ़ िजले के िनजामाबाद
नामक थान म आ था । इनके िपता का नाम भोलािसंह उपा ाय तथा माता का नाम णी दे वी था। ा ाय से इ ोने िह ी, अं ेजी,
फारसी, सं ृ त आिद भाषाओं का अ ा ान ा कर िलया। िनजामाबाद के िमिडल ू ल म अ ापक और काशी िह दू िव िवधालय
म अवैतिनक िश क के पद पर इ ोने काय िकया। सन् 1947 ई० म इनका दे हा हो गया ।
सािह क प रचय – ि वेदी युग के मु ख किव ‘ह रऔध’ जी ने गध और पध दोनों ही े ो म िह ी माता की सेवा की। ह रऔध जी
ने सव थम खड़ीबोली म का रचना करके यह िस कर िदया िक खड़ीबोली म जभाषा के समान सरसता और मधुरता आ सकती
है। ‘हरीऔध’ जी म एक े किव के सम गुण िवधमान थे । इनका ‘ि य वास’ महाका अपनी का गत िवशेषताओं के कारण िह ी
महाका ों म ‘माइल ोन’ माना जाता है । “इनकी एक सबसे बड़ी िवशेषता यह भी है िक ये िह ी के सावभौम किव है , यह खड़ीबोली, उदू
के मुहावरे , जभाषा, किठन सरल सब कार की का -रचना कर सकते है ।“
कृितयाँ - ‘अ याम’ के रचनाकार – नाभादस
ि य वास : खड़ीबोली का थम महाका है । ‘कमनाशा का हार’ कहानी है – िशव साद िसंह
वैदेही वनवास, पा रजात, रसकलश, अध खला फूल, चोखे चौपदे ।
Imp. मैिथलीशरण गु का सािह क प रचय
जीवन प रचय – मै िथलीशरण गु का ज िचरगाँ व ( झाँ सी ) म सन् 1886 ई० म आ था । इनके िपता सेठ रामचरण गु को
िह ी-सािह से िवशे ष ेम था । गु जी की िश ा-दी ा घर पर ही स ई । घर के सािह क वातावरण के कारण गु जी म का
के ित िवशे ष िच जा त ई । 12 िदस र, सन् 1964 ई० म गु जी का गवास हो गया ।
सािह क प रचय – ि वेदी युग के सबसे लोकि य किव मैिथलीशरण गु म बा ाव था से ही का ा क वृित िवधमान थी । ये
अ ाव था से ही िछट-पुट का रचनाएँ करने लगे थे । इनकी किवता मे रा भ एवं रा ेम का र मु ख प से मुख रत आ है ।
इसी कारण िह ी-सािह के त ालीन िव ानों ने इ े ‘रा किव’ की उपािध से िवभू िषत िकया । गु जी मुख प से ब का
रचना म िस ह थे ।
महावीर साद ि वेदी से स क होने के प ात गु जी की रचनाएँ ‘सर ती’ पि का म कािशत होने लगी । इनकी थम पु क ‘रं ग मे
भंग’ का काशन सन् 1909 ई० म आ ; िक ु इ ाित सन् 1912 ई० म कािशत पु क ‘भारत-भारती’ से िमलना ार ई।
इसी पु क ने गु जी को ‘रा किव’ के प म िव ात िकया। खड़ीबोली के प का िनधारण करने एवं उसके िवकास म गु जी
ने अपना अमू योगदान िदया।
कृितयाँ – गु जी की रचनाएँ दो कार की ह – अनूिदत व मौिलक । मोहन राकेश की रचनाएँ –
(क) मौिलक रचनाएँ – भारत-भारती, साकेत, यशोधरा, िस राज, पंचवटी । आ खरी च ान ( या ावृत )
(ख) अनू िदत रचनाएँ – ासी का यु , मेघनाद- वध , वृ - संहार कहानी – वा रस तथा कवाटर
1. िह ी गध – सािह के इितहास पर आधा रत ो र– { 5 अंक }
2. िह ी का – सािह के इितहास पर आधा रत ो र – { 5 अंक }
नोट – 1 व 2 को ंय अपने पा पु क से याद करे , **कम से कम 1000 याद करे ।
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3. िह ी गधांश पर आधा रत के उ र दीिजए – { 10 अं क }
नोट – केवल िन तीन पाठों का अ यन कर –
I. रा का प ( िनब ) – डॉ० वासुदेवशरण अ वाल
II. अशोक के फूल ( िनब ) – डॉ० हजारी साद ि वेदी
III. भाषा और आधुिनकता ( िनब ) – ो० जी० सु र रे ी
4. िह ी पधांश पर आधा रत के उ र दीिजए – { 10 अंक }
नोट – केवल िन चार पाठों का अ यन कर –
IV. पवन दू ितका – अयो ािसंह उपा ाय ‘हरीऔध’
V. कैकयी का अनुताप , गीत – मै िथलीशरण गु
VI. ा-मनु , गीत – जयशंकर साद
VII. नौका िवहार , बापू के ित , प रवतन – सुिम ान न पंत
.
5. िह ी गध लेखक के सािह क प रचय दे ते ए उनकी मु ख रचनाएँ िल खए – { 5 अंक }
डॉ० वासुदेवशरण अ वाल का सािह क प रचय
जीवन प रचय – डॉ० वासुदेवशरण अ वाल का ज सन् 1904 ई० म मे रठ जनपद के खेड़ा नामक ाम म आ था। इनके माता-
िपता लखनऊ म रहते थे , अत: इनका बा काल लखनऊ म ही तीत आ । यही से इ ोने अपनी ार क िश ा ा की । इ ोने
‘काशी िह दू िव िवधालय‘ से एम० ए० की परी ा उतीण की तथा डी० िलट् ० की उपािध भी ा की । इ ोने पािल , सं ृ त , अं ेजी
आिद भाषयों तथा ाचीन भारतीय सं ृ ित और पुरात का गहन अ यन िकया । सन् 1967 ई० म अ वाल जी का गवास हो गया।
.
सािह क प रचय – डॉ० वासुदेवशरण अ वाल लखनऊ और मथुरा के पुरात सं हालयों म िनरी क, के ीय पुरात िवभाग
के संचालक और रा ीय सं हालयों, िद ी के अ रहे । कुछ समय तक अ वाल जी ‘काशी िह दू िव िवधालय’ म इ ोलोंजी
िवभाग के अ भी रहे । इ ोने ागैितहािसक, वैिदक तथा पौरािणक सािह का मम उद् घाटन भी िकया। अ वाल जी ने मु प
से पु रात को ही अपना िवषय बनाया। डॉ० वासुदेवशरण अ वाल अनुस ता, िनब कार और संपादक के प म भी िति त थे ।
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भाषा शै ली – डॉ० वासुदेवशरण अ वाल की भाषा शु , सािह क, सं ृ तिन खड़ीबोली है । शैली के प म इ ोने े षा क ,
ा ा क एवं उ दरण शैिलयों को मु ख प से योग िकया है ।
कृितयाँ –
1. िनब सं ह – कला और सं ृ ित, पृ ी-पु , क वृ , माता-भू िम, वा ारा आिद ।
2. शोध – पािणिनकालीन भारत । 3. स ादन – प ावत, हषच रत, पािल आिद ।
Imp. डॉ० हजारी साद ि वेदी का सािह क प रचय
जीवन प रचय – आचाय हजारी साद ि वेदी जी का ज सन् 1907 ई० म बिलया िजले के ‘दु बे का छपरा’ नामक ाम म आ था ।
इनके िपता का नाम अनमोल ि वेदी तथा माता का नाम ोितकली दे वी था । ि वेदी जी ने अपनी ार क िश ा बिलया िजले के
िमिडल ू ल से ा की । इ ोने िह ी एवं सं ृ त भाषाओं का गहन अ यन िकया । 19 मई, सन् 1979 ई० म ये महान सािह कार
रोग श ा पर ही िचरिन ा म सो गया ।
,सािह क प रचय – डॉ० हजारी साद ि वेदी िह ी-सािह के ात िनब कार, आलोचक, स ादक, उप ासकार के अित र
एक कुशल व ा एवं सफल अ ापक के प म हमारे स ुख आते है । सन् 1949 ई० म ‘लखनऊ िव िवधालय‘ ने इ ‘डी० िलट् ०’ की
मानद उपािध से स ािनत िकया तथा सन् 1957 ई० म भारत सरकार ने इ े ‘प -भूषण’ की उपािध से िवभूिषत िकया । इनकी रचनाओं म
नवीनता और ाचीनता दोनों का सम िमलता है । इ ोने ‘अिभनव भारतीय’ तथा ‘िव भारती’ नामक का स ादन िकया। िह ी के
लिलत िनब को व थत प दान करने वाले िनब कारों म हजारी साद ि वेदी जी अ णी है ।
भाषा शैली – ि वेदी जी की भाषा शु , सािह क, प र ृ त, सं ृ त-िन खड़ीबोली है । इनकी रचनाओं म गवेषणा क, िवचारा क,
आलोचना क, भावा क आिद शैिलयों के दशन होते है ।
कृितयाँ – हजारी साद ि वेदी ;--
1. िनब -सं ह – अशोक के फूल, क लता, िवचार और िवतक आिद । िनब - कुटज, आलोक पव
2. उप ास – पुननवा, अनामदास का पोथा, बाणभ की आ कथा आिद ।
काल – छायावादो र युग
3. आलोचना – सुर-सािह , सािह -सहचर आिद । 4. इितहास – िह ी सािह का इितहास ।
. Imp. ो० जी० सु र रे ी का सािह क प रचय
जीवन प रचय – ो० जी० सु र रे ी जी का ज सन् 1919 ई० म आं दे श के बे ूर जनपद के ब ुलप नामक ाम मे आ
था। ो० जी० सु र रे ी आं दे श िव िवधालय म िह ी िवभाग के अ रहे । इनकी ार क िश ा सं ृ त एवं तेलुगु भाषा म ई।
रे ी जी आं दे श िव िवधालय म ातको र अ यन एवं अनु संधान िवभाग के अ भी रहे । इनके िनदशन म ‘िह ी और तेलुगु : एक
तुलना क अ यन’ ंथ पर शोध काय भी आ । इनका िनधन सन् 2005 ई० म हो गया ।
सािह क प रचय – अिह ी दे श के िनवासी होते ए भी ो० जी० सु र रे ी जी ने िह ी भाषा पर अ ा अिधकार ा कर
िलया था। रा वादी िह ी चारक, ात सािह कार एवं तुलना क सािह के मूध समी क, े िवचारक, समालोचक एवं
िनब कार सु र रे ी दि ण भारतीयो के िलए िह ी और उ र भारतीयो के िलए दि णी भाषायों के अ यन की ेरणा दी है । इ ोने
िह ी भािषयों के िलए तिमल, तेलुगु, क ड़ और मलयालम सािह की रचना की है । इनके अनेक िनब िह ी, अं ेजी एवं तेलुगु
प -पि काओं म कािशत ए। िह ी भाषी न होते भी रे ी जी ने िह ी को अपनी रचनाओं के प म जो अमू िनिध सौंपी है , उसके
िलए िह ी सािह सदै व ऋणी रहे गा ।
कृितयाँ – नोट – िह ी के िलए बे
सािह और समाज िह ी और तेलुगु : एक तुलना क अ यन यू ूब चैनल का नाम है -
मे रे िवचार दि ण की भाषाएँ और उनका सािह “Gyansiddu Classes”
वैचा रकी, शोध और बोध ल ेज ॉ म इन इ या ( स ािदत अं ेजी ंथ )
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ह रशं कर परसाई का सािह क प रचय
जीवन प रचय – ह रशंकर परसाई जी का ज 22 अग , सन् 1922 ई० म म दे श के होशंगाबाद िजले के जमानी नामक थान
म आ था। इनकी ार क िश ा म दे श म ई । इ ोने ‘नागपुर िव िवधालय’ से एम० ए० की िड ी ा की तथा कुछ समय
तक अ ापन-काय िकया । िक ु सािह म िवशे ष िच होने के कारण अ ापन काय छोड़कर पूण प से लेखन-काय म लग गए
और सािह -सेवा म जु ट गए। 10 अग , सन् 1995 ई० को ह रशंकर परसाई जी का दे हा हो गया ।
सािह क प रचय – ह रशंकर परसाई जी एक अ े िनब कार थे। सािह -सेवा के िलए इ ोने अपनी नौकरी को भी ाग िदया।
वष तक आिथक िवषमताओं को झे लते ए भी इ ोने ‘वसुधा’ नामक सािह क मािसक पि का का स ादन व काशन करते रहे।
सामािजक िवसंगितयों और गत दोषों को िनरावरण करने वाले ंगा क िनब ो के अित र परसाई जी ने कहािनयाँ और उप ास
भी िलखे ह। समय की कमजो रयों एवं राजनीित के फरे बों पर करारे ं िलखने मे ये िस दह थे।
भाषा शै ली – ह रशंकर परसाई की भाषा शु सािह क, प र ृ त खड़ीबोली है । इनकी रचनाओं म िवचारा क, गवेषणा क,
ा क, ं ा क आिद शै िलयों के दशन होते है ।
, कृितयाँ -
कहानी- सं ह – हँ सते है , रोते है , जै से उनके िदन िफर ।
उप ास – रानी नागफनी की कहानी , तट की खोज ।
िनब -सं ह – तब की बात और थी , िशकायत मु झे भी है , बेईमान की परत ।
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6. िह ी पध ले खक के सािह क प रचय दे ते ए उनकी मुख रचनाएँ िल खए – { 5 अंक }
अयो ािसंह उपा ाय ‘ह रऔध’ का सािह क प रचय
जीवन प रचय – अयो ािसंह उपा ाय ‘ह रऔध’ जी का ज सन् 1865 ई० म उ र दे श रा के आजमगढ़ िजले के िनजामाबाद
नामक थान म आ था । इनके िपता का नाम भोलािसंह उपा ाय तथा माता का नाम णी दे वी था। ा ाय से इ ोने िह ी, अं ेजी,
फारसी, सं ृ त आिद भाषाओं का अ ा ान ा कर िलया। िनजामाबाद के िमिडल ू ल म अ ापक और काशी िह दू िव िवधालय
म अवैतिनक िश क के पद पर इ ोने काय िकया। सन् 1947 ई० म इनका दे हा हो गया ।
सािह क प रचय – ि वेदी युग के मु ख किव ‘ह रऔध’ जी ने गध और पध दोनों ही े ो म िह ी माता की सेवा की। ह रऔध जी
ने सव थम खड़ीबोली म का रचना करके यह िस कर िदया िक खड़ीबोली म जभाषा के समान सरसता और मधुरता आ सकती
है। ‘हरीऔध’ जी म एक े किव के सम गुण िवधमान थे । इनका ‘ि य वास’ महाका अपनी का गत िवशेषताओं के कारण िह ी
महाका ों म ‘माइल ोन’ माना जाता है । “इनकी एक सबसे बड़ी िवशेषता यह भी है िक ये िह ी के सावभौम किव है , यह खड़ीबोली, उदू
के मुहावरे , जभाषा, किठन सरल सब कार की का -रचना कर सकते है ।“
कृितयाँ - ‘अ याम’ के रचनाकार – नाभादस
ि य वास : खड़ीबोली का थम महाका है । ‘कमनाशा का हार’ कहानी है – िशव साद िसंह
वैदेही वनवास, पा रजात, रसकलश, अध खला फूल, चोखे चौपदे ।
Imp. मैिथलीशरण गु का सािह क प रचय
जीवन प रचय – मै िथलीशरण गु का ज िचरगाँ व ( झाँ सी ) म सन् 1886 ई० म आ था । इनके िपता सेठ रामचरण गु को
िह ी-सािह से िवशे ष ेम था । गु जी की िश ा-दी ा घर पर ही स ई । घर के सािह क वातावरण के कारण गु जी म का
के ित िवशे ष िच जा त ई । 12 िदस र, सन् 1964 ई० म गु जी का गवास हो गया ।
सािह क प रचय – ि वेदी युग के सबसे लोकि य किव मैिथलीशरण गु म बा ाव था से ही का ा क वृित िवधमान थी । ये
अ ाव था से ही िछट-पुट का रचनाएँ करने लगे थे । इनकी किवता मे रा भ एवं रा ेम का र मु ख प से मुख रत आ है ।
इसी कारण िह ी-सािह के त ालीन िव ानों ने इ े ‘रा किव’ की उपािध से िवभू िषत िकया । गु जी मुख प से ब का
रचना म िस ह थे ।
महावीर साद ि वेदी से स क होने के प ात गु जी की रचनाएँ ‘सर ती’ पि का म कािशत होने लगी । इनकी थम पु क ‘रं ग मे
भंग’ का काशन सन् 1909 ई० म आ ; िक ु इ ाित सन् 1912 ई० म कािशत पु क ‘भारत-भारती’ से िमलना ार ई।
इसी पु क ने गु जी को ‘रा किव’ के प म िव ात िकया। खड़ीबोली के प का िनधारण करने एवं उसके िवकास म गु जी
ने अपना अमू योगदान िदया।
कृितयाँ – गु जी की रचनाएँ दो कार की ह – अनूिदत व मौिलक । मोहन राकेश की रचनाएँ –
(क) मौिलक रचनाएँ – भारत-भारती, साकेत, यशोधरा, िस राज, पंचवटी । आ खरी च ान ( या ावृत )
(ख) अनू िदत रचनाएँ – ासी का यु , मेघनाद- वध , वृ - संहार कहानी – वा रस तथा कवाटर